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तडित्वन्तो महामेघाश्चण्डश्वसनवेपिताः । प्रीणनं जीवनं ह्यस्य मुमुचुः करुणा इव ।। १०-२०-६ ।।

Flashing with lightning, great clouds were shaken and swept about by fierce winds. Just like merciful persons, the clouds gave their lives for the pleasure of this world. ।। 10-20-6 ।।

english translation

बिजली चमकाते बड़े बड़े बादल प्रचण्ड वायु के द्वारा हिलाये-डुलाये जाकर दूर ले जाये गये थे। ये बादल दयालु पुरुषों की तरह इस संसार की खुशी के लिए अपना जीवन दान कर रहे थे। ।। १०-२०-६ ।।

hindi translation

taDitvanto mahAmeghAzcaNDazvasanavepitAH | prINanaM jIvanaM hyasya mumucuH karuNA iva || 10-20-6 ||

hk transliteration by Sanscript

तपःकृशा देवमीढा आसीद्वर्षीयसी मही । यथैव काम्यतपसस्तनुः सम्प्राप्य तत्फलम् ।। १०-२०-७ ।।

The earth had been emaciated by the summer heat, but she became fully nourished again when moistened by the god of rain. Thus the earth was like a person whose body has been emaciated by austerities undergone for a material purpose, but who again becomes fully nourished when he achieves the fruit of those austerities. ।। 10-20-7 ।।

english translation

ग्रीष्म के ताप से पृथ्वी कृषकाय हो चुकी थी किन्तु वर्षा के देवता द्वारा तर किये जाने पर पुन: पूरी तरह हरीभरी हो गई। इस तरह पृथ्वी उस व्यक्ति के समान थी जिसका शरीर भौतिक कामना से की गई तपस्या के कारण कृषकाय हो जाता है किन्तु तपस्या का फल प्राप्त हो जाने पर वह पुन: पूरी तरह हष्ट पुष्ट हो उठता है। ।। १०-२०-७ ।।

hindi translation

tapaHkRzA devamIDhA AsIdvarSIyasI mahI | yathaiva kAmyatapasastanuH samprApya tatphalam || 10-20-7 ||

hk transliteration by Sanscript

निशामुखेषु खद्योतास्तमसा भान्ति न ग्रहाः । यथा पापेन पाखण्डा न हि वेदाः कलौ युगे ।। १०-२०-८ ।।

In the evening twilight during the rainy season, the darkness allowed the glowworms but not the stars to shine forth, just as in the Age of Kali the predominance of sinful activities allows atheistic doctrines to overshadow the true knowledge of the Vedas. ।। 10-20-8 ।।

english translation

वर्षा ऋतु के साँझ के धुंधलेपन में, अंधकार के कारण जुगनू तो चमक रहे थे किन्तु नक्षत्रगण प्रकाश नहीं बिखेर पा रहे थे, जिस प्रकार कि कलियुग में पापकृत्यों की प्रधानता से नास्तिक सिद्धान्त वेदों के असली ज्ञान को आच्छादित कर देते हैं। ।। १०-२०-८ ।।

hindi translation

nizAmukheSu khadyotAstamasA bhAnti na grahAH | yathA pApena pAkhaNDA na hi vedAH kalau yuge || 10-20-8 ||

hk transliteration by Sanscript

श्रुत्वा पर्जन्यनिनदं मण्डुकाः व्यसृजन् गिरः । तूष्णीं शयानाः प्राग्यद्वद्ब्राह्मणा नियमात्यये ।। १०-२०-९ ।।

The frogs, who had all along been lying silent, suddenly began croaking when they heard the rumbling of the rain clouds, in the same way that brāhmaṇa students, who perform their morning duties in silence begin reciting their lessons when called by their teacher. ।। 10-20-9 ।।

english translation

वे मेंढक जो अभी तक मौन पड़े हुए थे, वर्षा ऋतु के बादलों की गर्जना सुनकर अचानक टर्राने लगे मानो शान्त भाव से प्रात:कालीन कृत्य करनेवाले ब्राह्मण विद्यार्थी अपने गुरु द्वारा बुलाए जाने पर अपना पाठ सुनाने लगे हों। ।। १०-२०-९ ।।

hindi translation

zrutvA parjanyaninadaM maNDukAH vyasRjan giraH | tUSNIM zayAnAH prAgyadvadbrAhmaNA niyamAtyaye || 10-20-9 ||

hk transliteration by Sanscript

आसन्नुत्पथगामिन्यः क्षुद्रनद्योऽनुशुष्यतीः । पुंसो यथास्वतन्त्रस्य देहद्रविणसम्पदः ।। १०-२०-१० ।।

With the advent of the rainy season, the insignificant streams, which had become dry, began to swell and then strayed from their proper courses, like the body, property and money of a man controlled by the urges of his senses. ।। 10-20-10 ।।

english translation

वर्षा ऋतु के आगमन के साथ ही सूखी हुई क्षुद्र नदियाँ बढऩे लगीं और अपने असली मार्गों को छोडक़र इधर उधर बहने लगीं मानो इन्द्रियों के वशीभूत किसी मनुष्य के शरीर, सम्पत्ति तथा धन हों। ।। १०-२०-१० ।।

hindi translation

AsannutpathagAminyaH kSudranadyo'nuzuSyatIH | puMso yathAsvatantrasya dehadraviNasampadaH || 10-20-10 ||

hk transliteration by Sanscript