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तपःकृशा देवमीढा आसीद्वर्षीयसी मही । यथैव काम्यतपसस्तनुः सम्प्राप्य तत्फलम् ।। १०-२०-७ ।।

The earth had been emaciated by the summer heat, but she became fully nourished again when moistened by the god of rain. Thus the earth was like a person whose body has been emaciated by austerities undergone for a material purpose, but who again becomes fully nourished when he achieves the fruit of those austerities. ।। 10-20-7 ।।

english translation

ग्रीष्म के ताप से पृथ्वी कृषकाय हो चुकी थी किन्तु वर्षा के देवता द्वारा तर किये जाने पर पुन: पूरी तरह हरीभरी हो गई। इस तरह पृथ्वी उस व्यक्ति के समान थी जिसका शरीर भौतिक कामना से की गई तपस्या के कारण कृषकाय हो जाता है किन्तु तपस्या का फल प्राप्त हो जाने पर वह पुन: पूरी तरह हष्ट पुष्ट हो उठता है। ।। १०-२०-७ ।।

hindi translation

tapaHkRzA devamIDhA AsIdvarSIyasI mahI | yathaiva kAmyatapasastanuH samprApya tatphalam || 10-20-7 ||

hk transliteration by Sanscript