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स श्येनवेग उत्पत्य मुष्टीकृत्य करावुभौ । भगवन्तं वासुदेवं क्रुद्धो वक्षस्यबाधत ॥ १०-४४-२१ ॥
Furious, Cāṇūra attacked Lord Vāsudeva with the speed of a hawk and struck His chest with both fists. ॥ 10-44-21 ॥
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क्रुद्ध चाणूर ने बाज की गति से भगवान् वासुदेव पर आक्रमण किया और उनकी छाती पर अपनी दोनों मुट्ठियों (घूँसों) से प्रहार किया। ॥ १०-४४-२१ ॥
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नाचलत्तत्प्रहारेण मालाहत इव द्विपः । बाह्वोर्निगृह्य चाणूरं बहुशो भ्रामयन् हरिः ॥ १०-४४-२२ ॥
No more shaken by the demon’s mighty blows than an elephant struck with a flower garland, Lord Kṛṣṇa grabbed Cāṇūra by his arms, swung him around several times ॥ 10-44-22 ॥
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जिस तरह फूल की माला से मारने से हाथी कुछ भी नहीं होता उसी तरह असुर के बलशाली वारों से विचलित न होते हुए भगवान् कृष्ण ने चाणूर की भुजाओं को पकडक़र कई बार चारों ओर घुमाया ॥ १०-४४-२२ ॥
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भूपृष्ठे पोथयामास तरसा क्षीणजीवितम् । विस्रस्ताकल्पकेशस्रगिन्द्रध्वज इवापतत् ॥ १०-४४-२३ ॥
And hurled him onto the ground with great force. His clothes, hair and garland scattering, the wrestler fell down dead, like a huge festival column collapsing. ॥ 10-44-23 ॥
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और उसे बड़े वेग से पृथ्वी पर पटक दिया। उसके वस्त्र, केश तथा माला बिखर गये और वह पहलवान पृथ्वी पर गिरकर मर गया मानो कोई विशाल उत्सव-स्तम्भ गिर पड़ा हो। ॥ १०-४४-२३ ॥
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तथैव मुष्टिकः पूर्वं स्वमुष्ट्याभिहतेन वै । बलभद्रेण बलिना तलेनाभिहतो भृशम् ॥ १०-४४-२४ ॥
Similarly, Muṣṭika struck Lord Balabhadra with his fist and was slain. Receiving a violent blow from the mighty Lord’s palm, ॥ 10-44-24 ॥
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इसी प्रकार मुष्टिक पर भगवान् बलभद्र ने अपने मुक्के से प्रहार किया और उसका वध कर दिया। बलशाली भगवान् बलभद्र के हाथ का करारा थप्पड़ खाकर ॥ १०-४४-२४ ॥
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प्रवेपितः स रुधिरमुद्वमन् मुखतोऽर्दितः । व्यसुः पपातोर्व्युपस्थे वाताहत इवाङ्घ्रिपः ॥ १०-४४-२५ ॥
The demon trembled all over in great pain, vomited blood and then fell lifeless onto the ground, like a tree blown down by the wind. ॥ 10-44-25 ॥
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वह असुर भारी पीड़ा से काँपने लगा और रक्त वमन करने लगा। तत्पश्चात् निष्प्राण होकर जमीन पर उसी तरह गिर पड़ा जिस तरह हवा के झोंके से कोई वृक्ष धराशायी होता है। ॥ १०-४४-२५ ॥
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