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य एवं विसृजेद्धर्मं पारम्पर्यागतं नरः । कामाल्लोभाद्भयाद्द्वेषात्स वै नाप्नोति शोभनम् ।। १०-२४-११ ।।

This religious principle is based on sound tradition. Anyone who rejects it out of lust, enmity, fear or greed will certainly fail to achieve good fortune. ।। 10-24-11 ।।

english translation

यह धर्म स्वस्थ परम्परा पर आश्रित है। जो कोई काम, शत्रुता, भय या लोभ वश इसका बहिष्कार करता है उसे निश्चय ही सौभाग्य प्राप्त नहीं हो सकेगा। ।। १०-२४-११ ।।

hindi translation

ya evaM visRjeddharmaM pAramparyAgataM naraH | kAmAllobhAdbhayAddveSAtsa vai nApnoti zobhanam || 10-24-11 ||

hk transliteration by Sanscript

श्रीशुक उवाच वचो निशम्य नन्दस्य तथान्येषां व्रजौकसाम् । इन्द्राय मन्युं जनयन् पितरं प्राह केशवः ।। १०-२४-१२।।

Śukadeva Gosvāmī said: When Lord Keśava [Kṛṣṇa] heard the statements of His father, Nanda, and other senior residents of Vraja, He addressed His father as follows, to arouse anger in Lord Indra. ।। 10-24-12 ।।

english translation

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब भगवान् केशव [कृष्ण] ने अपने पिता नन्द तथा व्रज के अन्य गुरुजनों के कथनों को सुना तो इन्द्र के प्रति क्रोध उत्पन्न करने के उद्देश्य से उन्होंने अपने पिता को इस प्रकार सम्बोधित किया। ।। १०-२४-१२ ।।

hindi translation

zrIzuka uvAca vaco nizamya nandasya tathAnyeSAM vrajaukasAm | indrAya manyuM janayan pitaraM prAha kezavaH || 10-24-12||

hk transliteration by Sanscript

श्रीभगवानुवाच कर्मणा जायते जन्तुः कर्मणैव विलीयते । सुखं दुःखं भयं क्षेमं कर्मणैवाभिपद्यते ।। १०-२४-१३ ।।

Lord Kṛṣṇa said: It is by the force of karma that a living entity takes birth, and it is by karma alone that he meets his destruction. His happiness, distress, fear and sense of security all arise as the effects of karma. ।। 10-24-13 ।।

english translation

भगवान् कृष्ण ने कहा : कर्म से ही जीव जन्म लेता है और कर्म से ही उसका विनाश होता है। उसके सुख, दुख, भय तथा सुरक्षा की भावना का उदय कर्म के प्रभावों के रूप में होता है। ।। १०-२४-१३ ।।

hindi translation

zrIbhagavAnuvAca karmaNA jAyate jantuH karmaNaiva vilIyate | sukhaM duHkhaM bhayaM kSemaM karmaNaivAbhipadyate || 10-24-13 ||

hk transliteration by Sanscript

अस्ति चेदीश्वरः कश्चित्फलरूप्यन्यकर्मणाम् । कर्तारं भजते सोऽपि न ह्यकर्तुः प्रभुर्हि सः ।। १०-२४-१४ ।।

Even if there is some supreme controller who awards all others the results of their activities, He must also depend upon a performer’s engaging in activity. After all, there is no question of being the bestower of fruitive results unless fruitive activities have actually been performed. ।। 10-24-14 ।।

english translation

यदि कोई परम नियन्ता हो भी, जो अन्यों को उनके कर्मों का फल प्रदान करता हो तो उसे भी कर्म करने वाले पर आश्रित रहना होगा। वस्तुत: जब तक सकाम कर्म सम्पन्न न हो ले तब तक सकाम कर्मफलों के प्रदाता के अस्तित्व का प्रश्न ही नहीं उठता। ।। १०-२४-१४ ।।

hindi translation

asti cedIzvaraH kazcitphalarUpyanyakarmaNAm | kartAraM bhajate so'pi na hyakartuH prabhurhi saH || 10-24-14 ||

hk transliteration by Sanscript

किमिन्द्रेणेह भूतानां स्वस्वकर्मानुवर्तिनाम् । अनीशेनान्यथा कर्तुं स्वभावविहितं नृणाम् ।। १०-२४-१५ ।।

Living beings in this world are forced to experience the consequences of their own particular previous work. Since Lord Indra cannot in any way change the destiny of human beings, which is born of their own nature, why should people worship him? ।। 10-24-15 ।।

english translation

इस जगत में जीवों को अपने किसी विशेष पूर्व कर्म के परिणामों का अनुभव करने के लिए बाध्य किया जाता है। चूँकि भगवान् इन्द्र किसी तरह भी मनुष्यों के भाग्य को बदल नहीं सकते जो उनके स्वभाव से ही उत्पन्न होता है, तो फिर लोग उनकी पूजा क्यों करें? ।। १०-२४-१५ ।।

hindi translation

kimindreNeha bhUtAnAM svasvakarmAnuvartinAm | anIzenAnyathA kartuM svabhAvavihitaM nRNAm || 10-24-15 ||

hk transliteration by Sanscript