Progress:18.5%

तं नागभोगपरिवीतमदृष्टचेष्टमालोक्य तत्प्रियसखाः पशुपा भृशार्ताः । कृष्णेऽर्पितात्मसुहृदर्थकलत्रकामा दुःखानुशोकभयमूढधियो निपेतुः ।। १०-१६-१० ।।

When the members of the cowherd community, who had accepted Kṛṣṇa as their dearmost friend, saw Him enveloped in the snake’s coils, motionless, they were greatly disturbed. They had offered Kṛṣṇa everything — their very selves, their families, their wealth, wives and all pleasures. At the sight of the Lord in the clutches of the Kāliya snake, their intelligence became deranged by grief, lamentation and fear, and thus they fell to the ground. ।। 10-16-10 ।।

english translation

जब ग्वाल समुदाय के सदस्यों ने, जिन्होंने कृष्ण को अपना सर्वप्रिय मित्र मान रखा था, उन्हें नाग की कुण्डली में लिपटा हुआ और गतिहीन देखा तो वे अत्यधिक विचलित हो उठे। उन्होंने कृष्ण को अपना सर्वस्व—अपने आप को, अपने परिवार, अपनी सम्पत्ति, अपनी पत्नियाँ तथा सारे आनन्द—अर्पित कर रखा था। भगवान् को कालिय सर्प के चंगुल में देखकर उनकी बुद्धि शोक, पश्चात्ताप तथा भय से भ्रष्ट हो गई और वे पृथ्वी पर गिर पड़े। ।। १०-१६-१० ।।

hindi translation

taM nAgabhogaparivItamadRSTaceSTamAlokya tatpriyasakhAH pazupA bhRzArtAH | kRSNe'rpitAtmasuhRdarthakalatrakAmA duHkhAnuzokabhayamUDhadhiyo nipetuH || 10-16-10 ||

hk transliteration by Sanscript