रोहिणी देवकी चाथ परिष्वज्य व्रजेश्वरीम् । स्मरन्त्यौ तत्कृतां मैत्रीं बाष्पकण्ठ्यौ समूचतुः ॥ १०-८२-३७ ॥
Then Rohiṇī and Devakī both embraced the Queen of Vraja, remembering the faithful friendship she had shown them. Their throats choking with tears, they addressed her as follows. ॥ 10-82-37 ॥
english translation
तब रोहिणी और देवकी दोनों ने व्रज की रानी को गले लगाया, उस वफादार मित्रता को याद करते हुए जो उसने उन्हें दिखाई थी। आँसुओं से रुँधते गले में उन्होंने उसे इस प्रकार संबोधित किया। ॥ १०-८२-३७ ॥
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