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श्रीभगवानुवाच किमुपायनमानीतं ब्रह्मन् मे भवता गृहात् । अण्वप्युपाहृतं भक्तैः प्रेम्णा भूर्येव मे भवेत् । भूर्यप्यभक्तोपहृतं न मे तोषाय कल्पते ।। १०-८१-३ ।।

The Supreme Lord said: O brāhmaṇa, what gift have you brought Me from home? I regard as great even the smallest gift offered by My devotees in pure love, but even great offerings presented by nondevotees do not please Me. ।। 10-81-3 ।।

english translation

भगवान ने कहा: हे ब्राह्मण, तुम घर से मेरे लिए क्या उपहार लाए हो? मैं अपने भक्तों द्वारा शुद्ध प्रेम से दिए गए सबसे छोटे उपहार को भी महान मानता हूं, लेकिन गैर-भक्तों द्वारा दिए गए महान उपहार भी मुझे प्रसन्न नहीं करते हैं। ।। १०-८१-३ ।।

hindi translation

zrIbhagavAnuvAca kimupAyanamAnItaM brahman me bhavatA gRhAt | aNvapyupAhRtaM bhaktaiH premNA bhUryeva me bhavet | bhUryapyabhaktopahRtaM na me toSAya kalpate || 10-81-3 ||

hk transliteration by Sanscript