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सोऽहं तवाङ्घ्र्युपगतोऽस्म्यसतां दुरापं तच्चाप्यहं भवदनुग्रह ईश मन्ये । पुंसो भवेद्यर्हि संसरणापवर्गस्त्वय्यब्जनाभ सदुपासनया मतिः स्यात् ।। १०-४०-२८ ।।

Being thus fallen, I am approaching Your feet for shelter, O Lord, because although the impure can never attain Your feet, I think it is nevertheless possible by Your mercy. Only when one’s material life has ceased, O lotus-naveled Lord, can one develop consciousness of You by serving Your pure devotees. ।। 10-40-28 ।।

english translation

हे प्रभु, इस तरह पतित हुआ मैं आपके चरणों में शरण लेने आया हूँ, क्योंकि, यद्यपि अशुद्ध लोग आपके चरणों को कभी भी प्राप्त नहीं कर पाते, मेरा विचार है कि आपकी कृपा से तो यह संभव हो सका है। हे कमल-नाभ भगवान्, जब किसी का भौतिक जीवन समाप्त हो जाता है तभी वह आपके शुद्ध भक्तों की सेवा करके आपके प्रति चेतना उत्पन्न कर सकता है। ।। १०-४०-२८ ।।

hindi translation

so'haM tavAGghryupagato'smyasatAM durApaM taccApyahaM bhavadanugraha Iza manye | puMso bhavedyarhi saMsaraNApavargastvayyabjanAbha sadupAsanayA matiH syAt || 10-40-28 ||

hk transliteration by Sanscript