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का नाम वीर विख्यातं वदान्यं प्रियदर्शनम् । न वृणीत प्रियं प्राप्तं मादृशी त्वादृशं पतिम् ।। ४-२५-४१ ।।

O my dear hero, who in this world will not accept a husband like you? You are so famous, so magnanimous, so beautiful and so easily gotten. ।। 4-25-41 ।।

english translation

हे वीर पुरुष, इस संसार में ऐसी कौन (स्त्री) होगी जो तुम जैसे पति को स्वीकार नहीं करेगी? तुम इतने प्रसिद्ध, उदार, इतने सुन्दर तथा सुलभ हो। ।। ४-२५-४१ ।।

hindi translation

kA nAma vIra vikhyAtaM vadAnyaM priyadarzanam | na vRNIta priyaM prAptaM mAdRzI tvAdRzaM patim || 4-25-41 ||

hk transliteration by Sanscript

कस्या मनस्ते भुवि भोगिभोगयोः स्त्रिया न सज्जेद्भुजयोर्महाभुज । योऽनाथवर्गाधिमलं घृणोद्धतस्मितावलोकेन चरत्यपोहितुम् ।। ४-२५-४२ ।।

O mighty-armed, who in this world will not be attracted by your arms, which are just like the bodies of serpents? Actually you relieve the distress of husbandless women like us by your attractive smile and your aggressive mercy. We think that you are traveling on the surface of the earth just to benefit us only. ।। 4-25-42 ।।

english translation

हे महाबाहु, इस संसार में ऐसा कौन है, जो सर्प के शरीर जैसी तुम्हारी भुजाओं से आकृष्ट न हो जाये? वास्तव में तुम अपनी मोहक मुस्कान तथा अपनी छेड़छाड़ युक्त दया से हम जैसी पतिविहीन स्त्रियों के सन्ताप को दूर करते हो। हम सोचती हैं कि तुम केवल हमारे हित के लिए ही पृथ्वी पर विचरण कर रहे हो। ।। ४-२५-४२ ।।

hindi translation

kasyA manaste bhuvi bhogibhogayoH striyA na sajjedbhujayormahAbhuja | yo'nAthavargAdhimalaM ghRNoddhatasmitAvalokena caratyapohitum || 4-25-42 ||

hk transliteration by Sanscript

नारद उवाच इति तौ दम्पती तत्र समुद्य समयं मिथः । तां प्रविश्य पुरीं राजन् मुमुदाते शतं समाः ।। ४-२५-४३ ।।

The great sage Nārada continued: My dear King, those two — the man and the woman — supporting one another through mutual understanding, entered that city and enjoyed life for one hundred years. ।। 4-25-43 ।।

english translation

नारद मुनि ने आगे कहा : हे राजन्, वे दोनों—स्त्री तथा पुरुष—एक दूसरे का पारस्परिक सौहार्द द्वारा समर्थन करते हुए उस नगरी में प्रविष्ट हुए और उन्होंने एक सौ वर्षों तक जीवन का सुख भोगा। ।। ४-२५-४३ ।।

hindi translation

nArada uvAca iti tau dampatI tatra samudya samayaM mithaH | tAM pravizya purIM rAjan mumudAte zataM samAH || 4-25-43 ||

hk transliteration by Sanscript

उपगीयमानो ललितं तत्र तत्र च गायकैः । क्रीडन् परिवृतः स्त्रीभिर्ह्रदिनीमाविशच्छुचौ ।। ४-२५-४४ ।।

Many professional singers used to sing about the glories of King Purañjana and his glorious activities. When it was too hot in the summer, he used to enter a reservoir of water. He would surround himself with many women and enjoy their company. ।। 4-25-44 ।।

english translation

राजा पुरञ्जन की महिमा तथा महिमामय कार्यों का गान अनेक चारण किया करते थे। ग्रीष्म ऋृतु में जब बहुत गर्मी पड़ती तो वह जलाशय में प्रवेश करता था। उसके चारों ओर अनेक स्त्रियाँ होती थीं और वह उनके संग आनन्द उठाता। ।। ४-२५-४४ ।।

hindi translation

upagIyamAno lalitaM tatra tatra ca gAyakaiH | krIDan parivRtaH strIbhirhradinImAvizacchucau || 4-25-44 ||

hk transliteration by Sanscript

सप्तोपरि कृता द्वारः पुरस्तस्यास्तु द्वे अधः । पृथग्विषयगत्यर्थं तस्यां यः कश्चनेश्वरः ।। ४-२५-४५ ।।

Of the nine gates in that city, seven were on the surface and two were subterranean. A total of nine doors were constructed, and these led to different places. All the gates were used by the city’s governor. ।। 4-25-45 ।।

english translation

उस नगरी के नौ द्वारों में से सात तो भूतल पर थे और दो पृथ्वी के नीचे थे। कुल नौ द्वार बनाए गए थे और ये नवों द्वार भिन्न-भिन्न स्थानों को जाते थे। इन सारे द्वारों का उपयोग उस नगरी का अधीक्षक करता था। ।। ४-२५-४५ ।।

hindi translation

saptopari kRtA dvAraH purastasyAstu dve adhaH | pRthagviSayagatyarthaM tasyAM yaH kazcanezvaraH || 4-25-45 ||

hk transliteration by Sanscript