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दिष्ट्याऽऽगतोऽसि भद्रं ते ग्राम्यान् कामानभीप्ससे । उद्वहिष्यामि तांस्तेऽहं स्वबन्धुभिररिन्दम ।। ४-२५-३६ ।।

O killer of the enemy, you have somehow or other come here. This is certainly great fortune for me. I wish all auspicious things for you. You have a great desire to satisfy your senses, and all my friends and I shall try our best in all respects to fulfill your desires. ।। 4-25-36 ।।

english translation

हे शत्रुसंहारक, तुम किसी न किसी तरह यहाँ पर आये, यह मेरे लिए अत्यन्त सौभाग्य की बात है। तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हें अपनी इन्द्रियों को सन्तुष्ट करने की उत्कष्ठा है, अत: मैं तथा मेरे सभी मित्र तुम्हारी इच्छाओं को पूरा करने का भरसक प्रयास करेंगे। ।। ४-२५-३६ ।।

hindi translation

diSTyA''gato'si bhadraM te grAmyAn kAmAnabhIpsase | udvahiSyAmi tAMste'haM svabandhubhirarindama || 4-25-36 ||

hk transliteration by Sanscript

इमां त्वमधितिष्ठस्व पुरीं नवमुखीं विभो । मयोपनीतान् गृह्णानः कामभोगान् शतं समाः ।। ४-२५-३७ ।।

My dear lord, I have just arranged this city of nine gates for you so that you can have all kinds of sense gratification. You may live here for one hundred years, and everything for your sense gratification will be supplied. ।। 4-25-37 ।।

english translation

हे स्वामी, मैंने तुम्हारे लिए ही इस नौ द्वारों वाली नगरी की व्यवस्था की है, जिससे सभी प्रकार से तुम्हारी इन्द्रिय-तुष्टि हो सके। तुम यहाँ सौ वर्षों तक रह सकते हो और तुम्हें भोग की सारी सामग्री प्रदान की जायेगी। ।। ४-२५-३७ ।।

hindi translation

imAM tvamadhitiSThasva purIM navamukhIM vibho | mayopanItAn gRhNAnaH kAmabhogAn zataM samAH || 4-25-37 ||

hk transliteration by Sanscript

कं नु त्वदन्यं रमये ह्यरतिज्ञमकोविदम् । असम्परायाभिमुखमश्वस्तनविदं पशुम् ।। ४-२५-३८ ।।

How can I expect to unite with others, who are neither conversant about sex nor capable of knowing how to enjoy life while living or after death? Such foolish persons are like animals because they do not know the process of sense enjoyment in this life and after death. ।। 4-25-38 ।।

english translation

भला मैं अन्यों के साथ कैसे रमण करने की अपेक्षा कर सकती हूँ, क्योंकि न तो उन्हें रति का ज्ञान है, न वे जीवित अवस्था में अथवा मरने के बाद इस जीवन का भोग करना जानते हैं? ऐसे मूर्ख व्यक्ति पशुतुल्य हैं क्योंकि वे इन्द्रिय-भोग की क्रिया को न इस जीवन में और न ही मृत्यु के उपरान्त जानते हैं। ।। ४-२५-३८ ।।

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kaM nu tvadanyaM ramaye hyaratijJamakovidam | asamparAyAbhimukhamazvastanavidaM pazum || 4-25-38 ||

hk transliteration by Sanscript

धर्मो ह्यत्रार्थकामौ च प्रजानन्दोऽमृतं यशः । लोका विशोका विरजा यान्न केवलिनो विदुः ।। ४-२५-३९ ।।

The woman continued: In this material world, a householder’s life brings all kinds of happiness in religion, economic development, sense gratification and the begetting of children, sons and grandsons. After that, one may desire liberation as well as material reputation. The householder can appreciate the results of sacrifices, which enable him to gain promotion to superior planetary systems. All this material happiness is practically unknown to the transcendentalists. They cannot even imagine such happiness. ।। 4-25-39 ।।

english translation

सुन्दरी ने आगे कहा : इस संसार में गृहस्थ जीवन में ही धर्म, अर्थ, काम तथा पुत्र-पौत्र इत्यादि सन्ततियाँ उत्पन्न करने का सारा सुख है। इसके पश्चात् चाहे तो मोक्ष तथा भौतिक यश भी प्राप्त किया जा सकता है। गृहस्थ ही यज्ञ के फल का रस ग्रहण कर सकता है, जिससे उसे श्रेष्ठ लोकों की प्राप्ति होती है। योगियों (यतियों) के लिए यह भौतिक सुख अज्ञात जैसा है। वे ऐसे सुख की कल्पना भी नहीं कर सकते। ।। ४-२५-३९ ।।

hindi translation

dharmo hyatrArthakAmau ca prajAnando'mRtaM yazaH | lokA vizokA virajA yAnna kevalino viduH || 4-25-39 ||

hk transliteration by Sanscript

पितृदेवर्षिमर्त्यानां भूतानामात्मनश्च ह । क्षेम्यं वदन्ति शरणं भवेऽस्मिन् यद्गृहाश्रमः ।। ४-२५-४० ।।

The woman continued: According to authorities, the householder life is pleasing not only to oneself but to all the forefathers, demigods, great sages, saintly persons and everyone else. A householder life is thus beneficial. ।। 4-25-40 ।।

english translation

उस स्त्री ने आगे कहा : अधिकारियों के अनुसार गृहस्थ जीवन न केवल अपने को वरन् समस्त पितरों, देवताओं, ऋषियों, साधु पुरुषों तथा अन्य सबों को अच्छा लगने वाला है। इस प्रकार गृहस्थ जीवन अत्यन्त उपयोगी है। ।। ४-२५-४० ।।

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pitRdevarSimartyAnAM bhUtAnAmAtmanazca ha | kSemyaM vadanti zaraNaM bhave'smin yadgRhAzramaH || 4-25-40 ||

hk transliteration by Sanscript