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नारद उवाच इति तौ दम्पती तत्र समुद्य समयं मिथः । तां प्रविश्य पुरीं राजन् मुमुदाते शतं समाः ।। ४-२५-४३ ।।

The great sage Nārada continued: My dear King, those two — the man and the woman — supporting one another through mutual understanding, entered that city and enjoyed life for one hundred years. ।। 4-25-43 ।।

english translation

नारद मुनि ने आगे कहा : हे राजन्, वे दोनों—स्त्री तथा पुरुष—एक दूसरे का पारस्परिक सौहार्द द्वारा समर्थन करते हुए उस नगरी में प्रविष्ट हुए और उन्होंने एक सौ वर्षों तक जीवन का सुख भोगा। ।। ४-२५-४३ ।।

hindi translation

nArada uvAca iti tau dampatI tatra samudya samayaM mithaH | tAM pravizya purIM rAjan mumudAte zataM samAH || 4-25-43 ||

hk transliteration by Sanscript