ददर्श तत्राभिजितं धराधरं प्रोन्नीयमानावनिमग्रदंष्ट्रया । मुष्णन्तमक्ष्णा स्वरुचोऽरुणश्रिया जहास चाहो वनगोचरो मृगः ॥ ३-१८-२ ॥
He saw there the all-powerful Personality of Godhead in His boar incarnation, bearing the earth upward on the ends of His tusks and robbing him of his splendor with His reddish eyes. The demon laughed: Oh, an amphibious beast! ॥ 3-18-2 ॥
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वहाँ उसने सर्वशक्तिमान श्रीभगवान् को उनके वराह रूप में, अपनी दाढ़ों के अग्रभाग पर पृथ्वी को ऊपर की ओर धारण किये तथा अपनी लाल लाल आँखों से उसके समस्त तेज को हरते हुए देखा। इस पर वह असुर हँस पड़ा और बोला, “ओह! कैसा उभयचर पशु है?” ॥ ३-१८-२ ॥
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