Srimad Bhagavatam

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कतमोऽपि न वेनः स्यात्पञ्चानां पुरुषं प्रति । तस्मात्केनाप्युपायेन मनः कृष्णे निवेशयेत् ।। ७-१-३१ ।।

sanskrit

Somehow or other, one must consider the form of Kṛṣṇa very seriously. Then, by one of the five different processes mentioned above, one can return home, back to Godhead. Atheists like King Vena, however, being unable to think of Kṛṣṇa’s form in any of these five ways, cannot attain salvation. Therefore, one must somehow think of Kṛṣṇa, whether in a friendly way or inimically. ।। 7-1-31 ।।

english translation

मनुष्य को किसी न किसी प्रकार से कृष्ण के स्वरूप पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए। तब ऊपर बताई गई पाँच विधियों में से किसी एक के द्वारा वह भगवद्धाम वापस जा सकता है। लेकिन राजा वेन जैसे नास्तिक इन पाँचों विधियों में से किसी एक के द्वारा कृष्ण के स्वरूप का चिन्तन करने में असमर्थ होने से मोक्ष नहीं पा सकते। अतएव मनुष्य को चाहिए कि जैसे भी हो, चाहे मित्र बनकर या शत्रु बनकर, वह भगवान् का चिन्तन करे। ।। ७-१-३१ ।।

hindi translation

katamo'pi na venaH syAtpaJcAnAM puruSaM prati | tasmAtkenApyupAyena manaH kRSNe nivezayet || 7-1-31 ||

hk transliteration by Sanscript