1.
प्रथमोऽध्यायः
Chapter 1
2.
द्वितीयोऽध्यायः
Chapter 2
3.
तृतीयोऽध्यायः
Chapter 3
4.
चतुर्थोऽध्यायः
Chapter 4
5.
पञ्चमोऽध्यायः
Chapter 5
6.
षष्ठोऽध्यायः
Chapter 6
7.
सप्तमोऽध्यायः
Chapter 7
8.
अष्टमोऽध्यायः
Chapter 8
9.
नवमोऽध्यायः
Chapter 9
10.
दशमोऽध्यायः
Chapter 10
11.
एकादशोऽध्यायः
Chapter 11
12.
द्वादशोऽध्यायः
Chapter 12
13.
त्रयोदशोऽध्यायः
Chapter 13
14.
चतुर्दशोऽध्यायः
Chapter 14
15.
पञ्चदशोऽध्यायः
Chapter 15
16.
षोडशोऽध्यायः
Chapter 16
•
सप्तदशोऽध्यायः
Chapter 17
18.
अष्टादशोऽध्यायः
Chapter 18
19.
एकोनविंशोऽध्यायः
Chapter 19
20.
विंशोऽध्यायः
Chapter 20
21.
एकविंशोऽध्यायः
Chapter 21
22.
द्वाविंशोऽध्यायः
Chapter 22
23.
त्रयोविंशोऽध्यायः
Chapter 23
24.
चतुर्विंशोऽध्यायः
Chapter 24
25.
पञ्चविंशोऽध्यायः
Chapter 25
26.
षड्विंशोऽध्यायः
Chapter 26
27.
सप्तविंशोऽध्यायः
Chapter 27
28.
अष्टाविंशोऽध्यायः
Chapter 28
29.
एकोनत्रिंशोऽध्यायः
Chapter 29
30.
त्रिंशोऽध्यायः
Chapter 30
31.
एकत्रिंशोऽध्यायः
Chapter 31
सर्गादि योऽस्यानुरुणद्धि शक्तिभिर्द्रव्यक्रियाकारकचेतनात्मभिः । तस्मै समुन्नद्धनिरुद्धशक्तयेनमः परस्मै पुरुषाय वेधसे ।। ४-१७-३३ ।।
My dear Lord, by Your own potencies You are the original cause of the material elements, the performing instruments (the senses), the workers of the senses (the controlling demigods), the intelligence and the ego, as well as everything else. By Your energy You manifest this entire cosmic creation, maintain it and dissolve it. Through Your energy alone everything is sometimes manifest and sometimes not manifest. You are therefore the Supreme Personality of Godhead, the cause of all causes. I offer my respectful obeisances unto You. ।। 4-17-33 ।।
english translation
हे भगवन्, आप अपनी शक्तियों द्वारा भौतिक तत्त्वों, इन्द्रियों, इनके नियामक देवों, बुद्धि, अहंकार तथा प्रत्येक वस्तु के आदि कारण हैं। अपनी शक्ति से आप इस सम्पूर्ण दृश्य जगत की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं। आपकी ही शक्ति से प्रत्येक वस्तु कभी प्रकट होती है और कभी प्रकट नहीं होती है। अत: आप समस्त कारणों के कारण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। मैं आपको सादर नमस्कार करती हूँ। ।। ४-१७-३३ ।।
hindi translation
sargAdi yo'syAnuruNaddhi zaktibhirdravyakriyAkArakacetanAtmabhiH | tasmai samunnaddhaniruddhazaktayenamaH parasmai puruSAya vedhase || 4-17-33 ||
hk transliteration by Sanscript