Kamasutra

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सम्मुखं तं तु न वीक्षते । वीक्षिता व्रीडां दर्शयति । रुच्यमात्मानोऽङ्गमपदेशेन प्रकाशयति । प्रमत्तं प्रच्छन्नं नायकमतिक्रान्तं च वीक्षते ॥ २६ ॥

When he faces her, she does not look at him. When he looks at her, she shows embarrassment. She lets him catch a glimpse of some parts of her pretty limbs and watches to see whether the boy is amorously attentive and is not looking elsewhere.

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देखने की रीति अधिकांशतः युवतियाँ सम्मुख खड़े नायक को नहीं देखतीं नायक द्वारा देखे जाने पर लज्जा से मुख नीचा कर लेती है। अपने स्तन आदि मनोहर अंगों को किसी बहाने से दिखाती हैं। यदि नायक उनकी ओर उन्मुख न हो, असावधान हो या दूर हो, तो जी भरकर देखती हैं ॥ २६ ॥

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पृष्टा च किञ्चित् सस्मितमव्यक्ताक्षरमनवसितार्थं च मन्दमन्दमधोमुखी कथयति । तत्समीपे चिरं स्थानमभिनन्दति। दूरे स्थिता पश्यतु मामिति मन्यमाना परिजनं सवदनविकारमाभाषते। तं देशं न मुञ्चति ॥ २७ ॥

When questioned, she replies with a half-smile, in a low voice, with indistinct words, while lowering her head. If she is near him, she takes pleasure in staying there for a long moment. If he is far off, with the idea of "he must look at me," she speaks with those close to her without looking at them and does not leave the place.

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बोलने की रीति- अधिकांशतः युवतियाँ नायक द्वारा कुछ पूछे जाने पर मन्द मन्द मुस्काते हुए एवं मुख नीचा करके अस्पष्ट भाषा में ऐसा उत्तर देती है जिसका अर्थ शीघ्र ही समझ में न आये। नायक के पास देर तक ठहरना पसन्द करती हैं। दूर खड़ी 'यह मुझ देखे' ऐसा मानती हुई, अपने परिजनों के साथ मुख बनाकर बोलती हैं और उस स्थान को नहीं छोड़तीं ॥ २७ ॥

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यत्किञ्चिद् दृष्ट्वा विहसितं करोति । तत्र कथामवस्थानार्थमनुबध्नाति । बालस्याङ्कगतस्यालिङ्गनं चुम्बनं च करोति । परिचारिकायास्तिलकं च रचयति । परिजनानवष्टभ्य तास्ताश्च लीला दर्शयति ॥ २८ ॥

If he looks at her for an instant, she laughs and starts chatting so that he will not go away. Sitting on the young man's knees, she puts her arms around him and embraces him. She gets a maidservant to adjust the marks on her brow. She becomes vivacious with those next to her.

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भावप्रेरित चेष्टाएँ-जहाँ नायक खड़ा हो, वहाँ कुछ भी देखकर हँसती रहती हैं। वहाँ खड़े रहने के लिये बातें प्रारम्भ कर देती हैं। गोद में स्थित बालक का आलिङ्गन और चुम्बन करने लगती हैं। परिचारिका से अपना तिलक ठीक कराती हैं तथा परिजनों सहारा लेकर भावप्रेरित चेष्टाएँ दिखाने लगती हैं ॥ २८ ॥

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तन्मित्रेषु विश्वसिति । वचनं चैषां बहु मन्यते करोति च । तत्परिचारकैः सह प्रीतिं सङ्कथां यूतमिति च करोति । स्वकर्मसु च प्रभविष्णुरिवैतान्त्रियुङ्क्ते । तेषु च नायकसङ्कथामन्यस्य कथयत्स्ववहिता तां शृणोति ॥ २९ ॥

She questions his friends and sets great store by their assertions. She confides in the servants 'with whom she plays and chats. She evaluates her suitor according to what they say. She listens attentively to the gossip of her servants and others.

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नायक के सहचरों एवं अनुचरों के साथ व्यवहार नायक के मित्रों पर विश्वास करती है। उनकी बातों का समादर करती है और तदनुकूल ही व्यवहार करती है। उसके नौकरों के साथ प्रीतिपूर्ण वार्तालाप करती है और उनके साथ तारा, शतरंज आदि खेलती है। उसके नौकरों को स्वामी के समान आदेश देती है। यदि वे नायकविषयक बातें करते हैं तो उन्हें एकाग्रचित्त होकर सुनती है ॥ २९ ॥

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धात्रेयिकया चोदिता नायकस्योदवसितं प्रविशति तामन्तरा कृत्वा तेन सह द्यूतं क्रीडामालापं चायोजयितुमिच्छति । अनलङ्कृता दर्शनपथं परिहरति । कर्णपत्त्रमङ्गुलीयकं खजं वा तेन याचिता सधीरमेव गात्रादवतायं सख्या हस्ते ददाति । तेन च दत्तं नित्यं धारयति । अन्यवरसङ्कथासु विषण्णा भवति । तत्पक्षकैश्च सह न संसृज्यत इति ॥ ३० ॥

Going to the boy's house, she plays dice with him, and speaks of their desire to form a couple. She avoids showing herself without being well adorned. If he asks her to wear ear or hand ornaments or other jewels, she borrows them from a girlfriend. She always wears the ones he has given her. Any mention of another suitor displeases her, and she refuses the company of those 'who want to claim her hand.

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नायक से सम्पर्क की वाञ्छा धाय की पुत्री या सखी कहने पर नायक के घर चली जाती है। उस सखी को माध्यम बनाकर नायक के साथ छूत, खेल, वार्तालाप आदि करना चाहती है। नायक के सामने विना शृंगार किये नहीं आती। यदि वह कर्णफूल, अंगूठी या माता माँगता है, तो गम्भीरतापूर्वक शरीर से उतारकर सखी के हाथ पर रख देती है। नायक द्वारा दी गयी अंगूठी, माता आदि वस्तुओं को नित्य धारण करती है। दूसरे नायकों की कथा से विमुख हो जाती है और उनके पक्ष वालों के साथ संसर्ग नहीं करती ॥ ३० ॥

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