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वासुदेवे भगवति सर्वात्मनि परेऽमले । एकान्तित्वं गतो भक्त्या सर्वभूतसुहृत्समः ।। ९-२-११ ।।

Thereafter, Pṛṣadhra gained relief from all responsibilities, became peaceful in mind, and established control over all his senses. Being unaffected by material conditions, being pleased with whatever was available by the grace of the Lord to maintain body and soul together, and being equal toward everyone,।। 9-2-11 ।।

english translation

तत्पश्चात् पृषध्र ने सारे उत्तरदायित्वों से अवकाश ले लिया और शान्तचित्त होकर अपनी समग्र इन्द्रियों को वश में किया। भौतिक परिस्थितियों से अप्रभावित, भगवान् की कृपा से शरीर तथा आत्मा को बनाए रखने के लिए जो भी मिल जाय उसी से संतुष्ट एवं सब पर समभाव रखते हुए, ।। ९-२-११ ।।

hindi translation

vAsudeve bhagavati sarvAtmani pare'male | ekAntitvaM gato bhaktyA sarvabhUtasuhRtsamaH || 9-2-11 ||

hk transliteration by Sanscript

विमुक्तसङ्गः शान्तात्मा संयताक्षोऽपरिग्रहः । यदृच्छयोपपन्नेन कल्पयन् वृत्तिमात्मनः ।। ९-२-१२ ।।

He gave full attention to the Supreme Personality of Godhead, Vāsudeva, who is the transcendental Supersoul, free from material contamination. ।। 9-2-12 ।।

english translation

वह कल्मषहीन परमात्मा भगवान् वासुदेव पर ही अपना सारा ध्यान देने लगा। ।। ९-२-१२ ।।

hindi translation

vimuktasaGgaH zAntAtmA saMyatAkSo'parigrahaH | yadRcchayopapannena kalpayan vRttimAtmanaH || 9-2-12 ||

hk transliteration by Sanscript

आत्मन्यात्मानमाधाय ज्ञानतृप्तः समाहितः । विचचार महीमेतां जडान्धबधिराकृतिः ।। ९-२-१३ ।।

Thus Pṛṣadhra, fully satisfied in pure knowledge, always keeping his mind on the Supreme Personality of Godhead, achieved pure devotional service to the Lord and began traveling all over the world, without affection for material activities, as if he were deaf, dumb and blind. ।। 9-2-13 ।।

english translation

इस प्रकार शुद्ध ज्ञान से पूर्णत: सन्तुष्ट एवं अपने मन को भगवान् में ही लगाकर उसने भगवान् की शुद्धभक्ति प्राप्त की और सारे विश्व में विचरण करने लगा। उसे भौतिक कार्यकलापों से कोई लगाव न रहा मानो वह बहरा, गूँगा तथा अन्धा हो। ।। ९-२-१३ ।।

hindi translation

AtmanyAtmAnamAdhAya jJAnatRptaH samAhitaH | vicacAra mahImetAM jaDAndhabadhirAkRtiH || 9-2-13 ||

hk transliteration by Sanscript

एवंवृत्तो वनं गत्वा दृष्ट्वा दावाग्निमुत्थितम् । तेनोपयुक्तकरणो ब्रह्म प्राप परं मुनिः ।। ९-२-१४ ।।

With this attitude, Pṛṣadhra became a great saint, and when he entered the forest and saw a blazing forest fire, he took this opportunity to burn his body in the fire. Thus he achieved the transcendental, spiritual world. ।। 9-2-14 ।।

english translation

इस मनोवृत्ति से पृषध्र महान् सन्त बन गया और जब वह जंगल में प्रविष्ट हुआ और उसने प्रज्ज्वलित जंगल की आग देखी तो उसने उस अग्नि में अपने शरीर को भस्म कर डाला। इस तरह उसे दिव्य आध्यात्मिक जगत की प्राप्ति हुई। ।। ९-२-१४ ।।

hindi translation

evaMvRtto vanaM gatvA dRSTvA dAvAgnimutthitam | tenopayuktakaraNo brahma prApa paraM muniH || 9-2-14 ||

hk transliteration by Sanscript

कविः कनीयान् विषयेषु निःस्पृहो विसृज्य राज्यं सह बन्धुभिर्वनम् । निवेश्य चित्ते पुरुषं स्वरोचिषं विवेश कैशोरवयाः परं गतः ।। ९-२-१५ ।।

Being reluctant to accept material enjoyment, Manu’s youngest son, whose name was Kavi, gave up the kingdom before attaining full youth. Accompanied by his friends, he went to the forest, always thinking of the self-effulgent Supreme Personality of Godhead within the core of his heart. Thus he attained perfection. ।। 9-2-15 ।।

english translation

मनु के सबसे छोटे पुत्र कवि ने भौतिक भोगों को अस्वीकार करते हुए युवावस्था में पहुँचने के पूर्व ही राजपाट त्याग दिया। वह अपने हृदय में आत्म-तेजस्वी भगवान् का सदैव चिन्तन करते हुए अपने मित्रों सहित जंगल में चला गया। इस प्रकार उसने सिद्धि प्राप्त की। ।। ९-२-१५ ।।

hindi translation

kaviH kanIyAn viSayeSu niHspRho visRjya rAjyaM saha bandhubhirvanam | nivezya citte puruSaM svarociSaM viveza kaizoravayAH paraM gataH || 9-2-15 ||

hk transliteration by Sanscript