1.
प्रथमोऽध्यायः
Chapter 1
2.
द्वितीयोऽध्यायः
Chapter 2
3.
तृतीयोऽध्यायः
Chapter 3
4.
चतुर्थोऽध्यायः
Chapter 4
5.
पञ्चमोऽध्यायः
Chapter 5
6.
षष्ठोऽध्यायः
Chapter 6
7.
सप्तमोऽध्यायः
Chapter 7
8.
अष्टमोऽध्यायः
Chapter 8
9.
नवमोऽध्यायः
Chapter 9
10.
दशमोऽध्यायः
Chapter 10
11.
एकादशोऽध्यायः
Chapter 11
12.
द्वादशोऽध्यायः
Chapter 12
13.
त्रयोदशोऽध्यायः
Chapter 13
14.
चतुर्दशोऽध्यायः
Chapter 14
15.
पञ्चदशोऽध्यायः
Chapter 15
16.
षोडशोऽध्यायः
Chapter 16
17.
सप्तदशोऽध्यायः
Chapter 17
18.
अष्टादशोऽध्यायः
Chapter 18
19.
एकोनविंशोऽध्यायः
Chapter 19
20.
विंशोऽध्यायः
Chapter 20
21.
एकविंशोऽध्यायः
Chapter 21
•
द्वाविंशोऽध्यायः
Chapter 22
23.
त्रयोविंशोऽध्यायः
Chapter 23
24.
चतुर्विंशोऽध्यायः
Chapter 24
25.
पञ्चविंशोऽध्यायः
Chapter 25
26.
षड्विंशोऽध्यायः
Chapter 26
27.
सप्तविंशोऽध्यायः
Chapter 27
28.
अष्टाविंशोऽध्यायः
Chapter 28
29.
एकोनत्रिंशोऽध्यायः
Chapter 29
30.
त्रिंशोऽध्यायः
Chapter 30
31.
एकत्रिंशोऽध्यायः
Chapter 31
Progress:65.5%
अर्थेन्द्रियार्थाभिध्यानं सर्वार्थापह्नवो नृणाम् । भ्रंशितो ज्ञानविज्ञानाद्येनाविशति मुख्यताम् ।। ४-२२-३३ ।।
sanskrit
For human society, constantly thinking of how to earn money and apply it for sense gratification brings about the destruction of everyone’s interests. When one becomes devoid of knowledge and devotional service, he enters into species of life like those of trees and stones. ।। 4-22-33 ।।
english translation
धन कमाने तथा इन्द्रितृप्ति के लिए उसके उपयोग के विषय में निरन्तर सोचते रहने से मानव-समाज के प्रत्येक व्यक्ति का पुरुषार्थ विनष्ट होता है। जब कोई ज्ञान तथा भक्ति से शून्य हो जाता है, वह वृक्षों तथा पत्थरों की सी जड़ योनियों में प्रवेश करता है। ।। ४-२२-३३ ।।
hindi translation
arthendriyArthAbhidhyAnaM sarvArthApahnavo nRNAm | bhraMzito jJAnavijJAnAdyenAvizati mukhyatAm || 4-22-33 ||
hk transliteration by SanscriptSrimad Bhagavatam
Progress:65.5%
अर्थेन्द्रियार्थाभिध्यानं सर्वार्थापह्नवो नृणाम् । भ्रंशितो ज्ञानविज्ञानाद्येनाविशति मुख्यताम् ।। ४-२२-३३ ।।
sanskrit
For human society, constantly thinking of how to earn money and apply it for sense gratification brings about the destruction of everyone’s interests. When one becomes devoid of knowledge and devotional service, he enters into species of life like those of trees and stones. ।। 4-22-33 ।।
english translation
धन कमाने तथा इन्द्रितृप्ति के लिए उसके उपयोग के विषय में निरन्तर सोचते रहने से मानव-समाज के प्रत्येक व्यक्ति का पुरुषार्थ विनष्ट होता है। जब कोई ज्ञान तथा भक्ति से शून्य हो जाता है, वह वृक्षों तथा पत्थरों की सी जड़ योनियों में प्रवेश करता है। ।। ४-२२-३३ ।।
hindi translation
arthendriyArthAbhidhyAnaM sarvArthApahnavo nRNAm | bhraMzito jJAnavijJAnAdyenAvizati mukhyatAm || 4-22-33 ||
hk transliteration by Sanscript