न धर्मांश्चरेत्; एष्यत्फलत्वात् । सांशयिकत्वाच्च ॥ २१ ॥
Of what use is it to practice virtue, when its results are uncertain?
english translation
त्रिवर्ग के आचरण की आवश्यकता पर शंका- क्योंकि धर्म का फल भविष्य में मिलने वाला (अनिश्चित) होता है, अतः धर्मों का आचरण नहीं करना चाहिये। उनके फल मिलने में भी संशय रहता है ॥ २१ ॥
hindi translation
na dharmAMzcaret; eSyatphalatvAt | sAMzayikatvAcca || 21 ||
वरं सांशयिकान्निष्कादःसांशयिकः कार्षापणः । इति लौकायतिकाः ॥ २४ ॥
According to the materialists [laukayatika], an authen¬ tic copper coin is better than a false gold coin.
english translation
पारस्परिक असहमति के द्वितीय हेतु की लोकप्रसिद्धि बताते हैं-सन्दिग्ध निष्क (स्वर्णमुद्रा) को अपेक्षा असन्दिग्ध कार्यापण (ताम्रमुद्रा या ताँबे का सिका) का लाभ अधिक अच्छा है-ऐसा लौकायतिकों (लोकायत अर्थात् नास्तिक दर्शन के अनुयायी लोगों) का मत है ॥ २४ ॥
सूर्यताराग्रहचक्रस्य लोकार्थं बुद्धिपूर्वकमिव प्रवृत्तेर्दर्शनाद् वर्णाश्रमाचार- स्थितिलक्षणत्वाच्च लोकयात्राया हस्तगतस्य च बीजस्य भविष्यतः सस्यार्थे त्यागदर्शनाच्चरेद्धर्मानिति वात्स्यायनः ।। २५ ।।
Some people doubt the Scriptures, while they note that magical practices and words sometimes give results. This is why they carefully study the constellations and the movements of the sun, moon, and planets in the hope of obtaining profits of a material order. Others, however, more inclined to philosophy, whose be¬ havior conforms to the rules of society [varnashrama], during the pilgrimage of this life behave like one who sows the seed he holds in his hand, with a view to a future harvest. Such is the opinion of Vatsyayana.
english translation
धर्म पर की गयी शंकाओं का उत्तर- क्योंकि- (१) धर्म का उपदेश करने वाले शास्त्र (वेद, स्मृति आदि) अपौरुषेय (ईश्वरकृत या मन्त्रद्रष्टा ऋषियों द्वारा प्रणीत) हैं, इसलिये उनमें शंका नहीं की जा सकती, वे निश्य ही सत्य है। (२) कहीं शास्त्रों द्वारा निर्देशित अभिचार कम, शान्ति एवं पुष्टिवर्धक कर्मों का फल भी स्पष्ट देखा जाता है। (३) नक्षत्र, चन्द्र, सूर्य, तारागण एवं ग्रहचक्रों की लोकहित में बुद्धिपूर्वक के समान प्रवृत्ति देखी जाती है। (४) वर्ण एवं आश्रम व्यवस्था एवं उनके समस्त करणीय कर्मों का प्रतिपादन धर्म में ही किया गया है। (५) लोकयात्रा में हस्तगत बीज को भविष्य में उत्पन्न होने वाले अन्न के लिये भावी उत्पादन (फसल) हेतु छोड़ दिया जाता है। अतएव धर्म का आचरण अवश्य करना चाहिये- ऐसा महर्षि वात्स्यायन का मत है॥ २५॥