Srimad Bhagavatam

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न्यस्येदमात्मनि जगद्विलयाम्बुमध्ये शेषेऽऽत्मना निजसुखानुभवो निरीहः । योगेन मीलितदृगात्मनिपीतनिद्रस्तुर्ये स्थितो न तु तमो न गुणांश्च युङ्क्षे ।। ७-९-३२ ।।

sanskrit

O my Lord, O Supreme Personality of Godhead, after the annihilation the creative energy is kept in You, who appear to sleep with half-closed eyes. Actually, however, You do not sleep like an ordinary human being, for You are always in a transcendental stage, beyond the creation of the material world, and You always feel transcendental bliss. As Kāraṇodakaśāyī Viṣṇu, You thus remain in Your transcendental status, not touching material objects. Although You appear to sleep, this sleeping is distinct from sleeping in ignorance. ।। 7-9-32 ।।

english translation

हे परमेश्वर, संहार के बाद सृजनात्मक शक्ति आप में स्थित रखी जाती है और आप अपनी अधखुली आँखों से सोते प्रतीत होते हैं। किन्तु तथ्य तो यह है कि आप एक सामान्य व्यक्ति की भाँति सोते नहीं, क्योंकि आप भौतिक जगत की सृष्टि के परे सदैव दिव्य अवस्था में रहते हैं और सदैव दिव्य आनन्द का अनुभव करते हैं। इस तरह क्षीरोदकशायी विष्णु के रूप में आप भौतिक वस्तुओं को छुए बिना अपनी दिव्य स्थिति में बने रहते हैं। यद्यपि आप सोते प्रतीत होते हैं, किन्तु यह सोना अविद्या की निद्रा से पृथक् होता है। ।। ७-९-३२ ।।

hindi translation

nyasyedamAtmani jagadvilayAmbumadhye zeSe''tmanA nijasukhAnubhavo nirIhaH | yogena mIlitadRgAtmanipItanidrasturye sthito na tu tamo na guNAMzca yuGkSe || 7-9-32 ||

hk transliteration by Sanscript