1.
प्रथमोऽध्यायः
Chapter 1
2.
द्वितीयोऽध्यायः
Chapter 2
3.
तृतीयोऽध्यायः
Chapter 3
4.
चतुर्थोऽध्यायः
Chapter 4
5.
पञ्चमोऽध्यायः
Chapter 5
6.
षष्ठोऽध्यायः
Chapter 6
•
सप्तमोऽध्यायः
Chapter 7
8.
अष्टमोऽध्यायः
Chapter 8
9.
नवमोऽध्यायः
Chapter 9
10.
दशमोऽध्यायः
Chapter 10
11.
एकादशोऽध्यायः
Chapter 11
12.
द्वादशोऽध्यायः
Chapter 12
13.
त्रयोदशोऽध्यायः
Chapter 13
14.
चतुर्दशोऽध्यायः
Chapter 14
15.
पञ्चदशोऽध्यायः
Chapter 15
16.
षोडशोऽध्यायः
Chapter 16
17.
सप्तदशोऽध्यायः
Chapter 17
18.
अष्टादशोऽध्यायः
Chapter 18
19.
एकोनविंशोऽध्यायः
Chapter 19
20.
विंशोऽध्यायः
Chapter 20
21.
एकविंशोऽध्यायः
Chapter 21
22.
द्वाविंशोऽध्यायः
Chapter 22
23.
त्रयोविंशोऽध्यायः
Chapter 23
24.
चतुर्विंशोऽध्यायः
Chapter 24
25.
पञ्चविंशोऽध्यायः
Chapter 25
26.
षड्विंशोऽध्यायः
Chapter 26
27.
सप्तविंशोऽध्यायः
Chapter 27
28.
अष्टाविंशोऽध्यायः
Chapter 28
29.
एकोनत्रिंशोऽध्यायः
Chapter 29
30.
त्रिंशोऽध्यायः
Chapter 30
31.
एकत्रिंशोऽध्यायः
Chapter 31
Progress:19.0%
यजमान्युवाच स्वागतं ते प्रसीदेश तुभ्यं नमः श्रीनिवास श्रिया कान्तया त्राहि नः । त्वामृतेऽधीश नाङ्गैर्मखः शोभते शीर्षहीनः कबन्धो यथा पूरुषः ।। ४-७-३६ ।।
sanskrit
The wife of Dakṣa prayed as follows: My dear Lord, it is very fortunate that You have appeared in this arena of sacrifice. I offer my respectful obeisances unto You, and I request that You be pleased on this occasion. The sacrificial arena is not beautiful without You, just as a body is not beautiful without the head. ।। 4-7-36 ।।
english translation
दक्ष की पत्नी ने इस प्रकार प्रार्थना की—हे भगवान्, यह हमारा सौभाग्य है कि आप यज्ञस्थल में पधारे हैं। मैं आपको सादर नमस्कार करती हूँ और आपसे प्रार्थना करती हूँ कि इस अवसर पर आप प्रसन्न हों। यह यज्ञस्थल आपके बिना शोभा नहीं पा रहा था, जिस प्रकार कि सिर के बिना धड़ शोभा नहीं पाता। ।। ४-७-३६ ।।
hindi translation
yajamAnyuvAca svAgataM te prasIdeza tubhyaM namaH zrInivAsa zriyA kAntayA trAhi naH | tvAmRte'dhIza nAGgairmakhaH zobhate zIrSahInaH kabandho yathA pUruSaH || 4-7-36 ||
hk transliteration by SanscriptSrimad Bhagavatam
Progress:19.0%
यजमान्युवाच स्वागतं ते प्रसीदेश तुभ्यं नमः श्रीनिवास श्रिया कान्तया त्राहि नः । त्वामृतेऽधीश नाङ्गैर्मखः शोभते शीर्षहीनः कबन्धो यथा पूरुषः ।। ४-७-३६ ।।
sanskrit
The wife of Dakṣa prayed as follows: My dear Lord, it is very fortunate that You have appeared in this arena of sacrifice. I offer my respectful obeisances unto You, and I request that You be pleased on this occasion. The sacrificial arena is not beautiful without You, just as a body is not beautiful without the head. ।। 4-7-36 ।।
english translation
दक्ष की पत्नी ने इस प्रकार प्रार्थना की—हे भगवान्, यह हमारा सौभाग्य है कि आप यज्ञस्थल में पधारे हैं। मैं आपको सादर नमस्कार करती हूँ और आपसे प्रार्थना करती हूँ कि इस अवसर पर आप प्रसन्न हों। यह यज्ञस्थल आपके बिना शोभा नहीं पा रहा था, जिस प्रकार कि सिर के बिना धड़ शोभा नहीं पाता। ।। ४-७-३६ ।।
hindi translation
yajamAnyuvAca svAgataM te prasIdeza tubhyaM namaH zrInivAsa zriyA kAntayA trAhi naH | tvAmRte'dhIza nAGgairmakhaH zobhate zIrSahInaH kabandho yathA pUruSaH || 4-7-36 ||
hk transliteration by Sanscript