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कृमिविड्भस्मसंज्ञान्ते राजनाम्नोऽपि यस्य च । भूतध्रुक् तत्कृते स्वार्थं किं वेद निरयो यतः ।। १२-२-४१ ।।

Even though a person’s body may now have the designation “king,” in the end its name will be “worms,” “stool” or “ashes.” What can a person who injures other living beings for the sake of his body know about his own self-interest, since his activities are simply leading him to hell? ।। 12-2-41 ।।

english translation

भले ही किसी व्यक्ति के शरीर को अब "राजा" पदनाम दिया गया हो, अंत में इसका नाम "कीड़े," "मल" या "राख" होगा। जो व्यक्ति अपने शरीर के लिए दूसरे प्राणियों को कष्ट पहुँचाता है, वह अपने स्वार्थ के बारे में क्या जान सकता है, क्योंकि उसकी गतिविधियाँ उसे सीधे नरक की ओर ले जा रही हैं? ।। १२-२-४१ ।।

hindi translation

kRmiviDbhasmasaMjJAnte rAjanAmno'pi yasya ca | bhUtadhruk tatkRte svArthaM kiM veda nirayo yataH || 12-2-41 ||

hk transliteration by Sanscript