Srimad Bhagavatam

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तस्यैव हेतोः प्रयतेत कोविदोनलभ्यते यद्भ्रमतामुपर्यधः । तल्लभ्यते दुःखवदन्यतः सुखंकालेन सर्वत्र गभीररंहसा ।। १-५-१८ ।।

sanskrit

Persons who are actually intelligent and philosophically inclined should endeavor only for that purposeful end which is not obtainable even by wandering from the topmost planet [Brahmaloka] down to the lowest planet [Pātāla]. As far as happiness derived from sense enjoyment is concerned, it can be obtained automatically in course of time, just as in course of time we obtain miseries even though we do not desire them. ।। 1-5-18 ।।

english translation

जो व्यक्ति वास्तव में बुद्धिमान तथा तत्वज्ञान में रूचि रखने वाले हैं, उन्हें चाहिए कि वे उस सार्थक अन्त के लिए ही प्रयत्न करें, जो उच्चतम लोक (ब्रह्मलोक) से लेकर निम्नतम लोक (पाताल) तक विचरण करने से भी प्राप्य नहीं है। जहाँ तक इन्द्रिय-भोग से प्राप्त होने वाले सुख की बात है, यह तो कालक्रम से स्वत: प्राप्त होता है, जिस प्रकार हमारे न चाहने पर भी हमें दुख मिलते रहते हैं। ।। १-५-१८ ।।

hindi translation

tasyaiva hetoH prayateta kovidonalabhyate yadbhramatAmuparyadhaH | tallabhyate duHkhavadanyataH sukhaMkAlena sarvatra gabhIraraMhasA || 1-5-18 ||

hk transliteration by Sanscript