Kamasutra

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स्तनपृष्ठे मेखलापथे चोत्पलपत्त्राकृतीत्युत्पलपत्रकम् ॥ २१ ॥

The lotus leaf : On the side of the breasts or on the buttocks, a mark looking like a lotus leaf is known as such.

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उत्पलपत्रक स्तनों एवं कमर में नखों से अङ्कित कमल की आकृति का चिह्न उत्पल- पत्रक कहलाता है ॥ २१॥

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ऊर्वोः स्तनपृष्ठे च प्रवासं गच्छतः स्मारणीयकं संहताश्चतस्त्रस्तिस्त्रो वा लेखाः । इति नखकर्माणि ॥ २२ ॥

When a man leaves on a journey, in order to remind his mistress of him, he traces three or four lines on her breasts or thighs with his nails.

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स्मारणीयक – प्रवास जाते समय पुरुष, स्त्री के स्तनों और जाँपों पर स्मृति के लिये मिली हुई तीन या चार रेखाएं खींच देते हैं स्मृति के लिये होने के कारण ये स्मारणीयक कहलाते हैं। नखक्षत के भेद समाप्त हुए। २२ ॥

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आकृतिविकारयुक्तानि चान्यान्यपि कुर्वीत ॥ २३ ॥

Apart from the above, he may also mark her in other ways.

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इनके अतिरिक्त अन्य वस्तुओं की आकृति के चिह्न भी बनाने चाहिये ॥ २३ ॥

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विकल्पानामनन्तत्वादानन्त्याच्च कौशलविधेरभ्यासस्य च सर्वगामित्वाद्- रागात्मकत्वाच्छेद्यस्य प्रकारान् कोऽभिसमीक्षितुमईतीत्याचार्याः ॥ २४ ॥

Since imagination knows no limits, variations are innumerable when practiced with astuteness. Nail scratching being so widely used as an erotic stimulant when practiced properly, how could the authors of the Kama Shastra enumerate all its varieties?

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भेद और कौशल की अनन्तताख के भेद अनन्त है, कौशल की भी कोई सीमा नहीं है, और यह व्यक्ति के अभ्यास पर निर्भर करता है, फलतः उसे सभी स्थलों पर और सभी प्रकार के नखक्षत करने का अभ्यास होना चाहिये। क्योंकि कामातुर होकर ही नायक नक्षत का प्रयोग करता है, अतः उसके समस्त भेदों की समीक्षा (विवेचना) कौन कर सकता है- ऐसा कामशास्त्र के आचार्यों का मत है ॥ २४ ॥

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भवति हि रागेऽपि चित्रापेक्षा वैचित्र्याच्च परस्परं रागो जनयितव्यः । वैचक्षण्ययुक्ताश्च गणिकास्तत्कामिनश्च परस्परं प्रार्थनीया भवन्ति । धनुर्वेदादिष्वपि हि शस्त्रकर्मशास्त्रेषु वैचित्र्यमेवापेक्ष्यते किं पुनरिहेति वात्स्यायनः ॥ २५ ॥

Passion feeds on varied practices. Variety fosters mutual attraction. The courtesan is interesting to an erotic man due to her particular talents, an interest which is mutual. In treatises on the arts of war, the texts speak of the need for a diversity of weapons. What should we say in our own case, asks Vatsyayana.

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वात्स्यायन का मत सामान्य अवस्था में ही नहीं, रागावस्था में भी वैचित्र्य की अपेक्षा रहती है, क्योंकि वैचित्र्य से ही नायक और नायिका परस्पर राग (कामोदेक) को उत्पन्न करते हैं। यही कारण है कि कामकलानिपुण गणिका और क्रियाविदग्ध कामी, दोनों एक-दूसरे की कामना करते हैं। जब शस्त्रकर्म से सम्बद्ध धनुर्वेद आदि शास्त्रों में भी शस्त्रसञ्चालन का वैचित्र्य अपेक्षित रहता है, तब कामशास्त्र में, जिसका उद्देश्य हो नवीनता और सरसता से प्रेम और काम की अभिवृद्धि करना है, कलानैपुण्य और क्रियावैचित्र्य का महत्त्व क्यों न अपेक्षित हो ऐसा महर्षि वात्स्यायन का मत है ॥ २५ ॥

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