Kamasutra

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तच्च न । सामान्येऽपि भ्रान्तिसंस्कारे कुलालचकस्य भ्रमरकस्य वा भ्रान्तावेव वर्तमानस्य प्रारम्भे मन्दवेगता ततश्च क्रमेण पूरणं वेगस्येत्युपपद्यते। धातुक्षयाच्च विरामाभीप्सेति। तस्मादनाक्षेपः ॥ २१ ॥

When the potter starts his wheel moving, the speed, initially slow, increases little by little, then slows down and stops. It appears that it is the same in exciting a woman from the beginning to the end.

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बाभ्रव्य का समाधान – ऐसी शङ्का करना ठीक नहीं है। सामान्यतः घूमने वाले कुम्हार के चाक (चक्र) या लट्टू (भ्रमरक) में घूमने की क्रिया निरन्तर विद्यमान रहने पर भी वे प्रारम्भ में मन्दवेग से घूमते हैं। बाद में क्रमशः उनका वेग बढ़ता है, और अन्त में वेग बन्द हो जाता है। इसी प्रकार स्त्री का स्खलन भी प्रारम्भ में मन्द रहता है, तदुपरान्त वह क्रमशः बढ़ता है, और च्युत हुए रज के पूर्णतः झड़ जाने पर वह समागम से विराम चाहती है। इसमें शङ्का के लिये कोई अवकाश नहीं है॥ २१ ॥

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सुरतान्ते सुखं पुंसां स्त्रीणां तु सततं सुखम्। धातुक्षयनिमित्ता च विरामेच्छोपजायते ॥ २२ ॥

According to the text of the Babhravyas, man experiences pleasure up to ejaculation, 'while the woman's pleasure is continuous. When he has ejected his semen, he seeks rest, whereas she wishes to continue.

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बाभ्रव्य का सार-संक्षेप-पुरुष को स्खलन-सुख समागम के अन्त में ही प्राप्त होता है किन्तु स्त्रियों को वह सुखानुभूति प्रारम्भ से अन्त तक होती रहती है, और स्थान से च्युत हुए सम्पूर्ण धातु (रज) के झड़ जाने पर समागम से विराम की इच्छा होती है॥ २२ ॥

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तस्मात् पुरुषवदेव योषितोऽपि रसव्यक्तिर्द्रष्टव्या ॥ २३ ॥

Vatsyayana's opinion is that a woman, like the man, experiences the same sexual enjoyment from start to finish.

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वात्स्यायन का मत — इससे यही समझना चाहिये कि पुरुष के समान स्त्री को भी समागम के अन्त में सुखानुभूति (स्खलन-सुख) होती है ॥ २३ ॥

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कथं हि समानायामेवाकृतावेकार्थमभिप्रपन्नयोः कार्यवैलक्षण्यं स्यात् ? ॥ २४ ॥

How is it possible for two beings belonging to the same species and practicing the same act not to feel the same pleasure?

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स्त्री-पुरुष के सुख की अभिन्नता समान जाति और समान कार्य में संलग्न स्त्री- पुरुष का सुख परस्पर भिन्न कैसे हो सकता है? अर्थात् दोनों का सुख परस्पर अभिन्न ही होगा ? ॥ २४ ॥

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उपायवैलक्षण्यादभिमानवैलक्षण्याच्च ॥ २५ ॥

25 Differences exist only in advances and in secondary actions [caresses, kisses, etc.].

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उपाय (स्थिति) और अनुभूति में भिन्नता होने से सुखानुभूति में भिन्नता हो सकती है ।॥ २५ ॥

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