Kamasutra
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गृहीतविद्यः प्रतिग्रहजयक्रयनिर्वेशाधिगतैरर्थैरन्वयागतैरुभयैर्वा गार्हस्थ्यं अधिगम्य नागरकवृत्तं वर्तेत ॥ १ ॥
Having completed his studies and acquired the means of livelihood by gifts received, conquest, trade, and work, or else by inheritance, or both and, having married, the well-bred townsman [nagaraka] must settle down in a refined manner.
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प्रकरणसम्बन्ध - विद्याग्रहण किया हुआ युवक दान, विजय, व्यापार तथा भृति (नौकरी) से अथवा पैतृक सम्पति से या अर्जन एवं सम्पत्ति दोनों से धन प्राप्त कर गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर, नागरकों (रसिक या विदग्ध) के समान आचरण करे ॥ १ ॥
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नगरे पत्तने खर्वटे महति वा सज्जनाश्रये स्थानम्। चात्रावशाद्वा ॥ २ ॥
He must establish himself in a big city, a town, or even a large village, near the mountains, where a decent number of persons of good society are living. He may also, for a time, go journeying.
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नागरक का वास नागरकर के निर्वाह के लिये परान नगर महत् (पांच सौ ग्रामों में भड़ा ग्राम और खवंट (दो सौ ग्रामों में बड़ा ग्राम) इनमें से कहीं भी सज्जनों के मध्य निवास करें, अथवा जहाँ अपनी जीविका हो, वहाँ रहे ॥ २ ॥
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तत्र भवनमासनोदकं वृक्षवाटिकावद् विभक्तकर्मकक्ष द्विवासगृह कारयेत् ॥ ३ ॥
He must build himself a house with two separate apartments, on a site near water, with trees and a garden and a separate place of work.
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वहाँ जल के निकट, वाटिका से सम्पदा के दो प्रकोशों (महिः प्रकोष्ठ और अन्तःप्रकोष्ठ) से युक्त घर बनाने, जिसमें भिन्न भिन्न कार्यों के लिये भिन्न भिन्न क निर्मित हों ॥३॥
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बाह्ये च वासगृहे सुश्लक्ष्णभयोपधानं मध्ये विनतं शुक्लोत्तरच्छदं शयनीयं स्यात् । प्रतिशयिका च तस्य शिरोभागे कूर्यस्थानम् वेदिका च तत्र रात्रिशेषमनु- लेपनं माल्यं सिक्थकरण्डकं सौगन्धिकपुटिका मातुलुङ्गत्वचस्ताम्बूलानि च स्युः । भूमौ पतद्ग्रहः । नागदन्तावसक्ता बीणा चित्रफलकम् वर्तिकासमुद्गकः । यः कक्षित्पुस्तकः कुरण्टकमाला नातिदूरे भूमी वृत्तास्तरणं समस्तकम् आकर्ष- फलकं द्यूतफलकं च । तस्य बहिः क्रीडाशकुनिपज्ञ्जराणि एकान्ते च तक्ष- तक्षणस्थानमन्यासां च क्रीडानाम्। स्वास्तीर्णा प्रेङ्गादोला वृक्षवाटिकायां सप्रच्छाया स्थण्डिलपीठिका च सकुसुमेति भवनविन्यासः ॥ ४ ॥
The antechamber, outside the private apartments, must be vast, pleasant, with a wide divan in the center covered with a white cloth. Close to this great bed, another similar one shall be placed, for the games of love.
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गृहसज्जा निवासगृह के महाप्रकोड में नर्म और मुलायम (गद्देदार) पर्यङ्क (प बिछा हुआ होना चाहिये जो बीच में झुका हो उस पर सफेद धुली हुई चादर बिछी हुई हो और सिरहाने एवं पायताने दोनों ओर तकिये लगे हुए हों। पर्यङ्क के पास एक छोटी एवं सबित चारपाई रतिकर्म के लिए होनी चाहिये। उस पर्यक के सिरहाने कूर्यस्थान पर, समान ऊँचाई पर वेदिका होनी चाहिये। उस वैदिका पर रात्रि का अवशिष्ट अङ्गराग, पुष्पमालाएँ, मोमबत्ती, सुगन्धित पदार्थों की टोकरी (बाँस की छोटी डलिया), मातुलुङ्ग की छाल और पान रखे हुए हों। चारपाई के निकट भूमि पर पीकदान रखा हुआ हो। हाथीदाँत को खूँटी पर वीणा लटकी हुई हो। चित्र बनाने का फलक (कैनवस), कूँची (तूलिका) और रङ्गों के डिब्बे हों, कुछ पुस्तकें हों, और शीघ्र न मुरझाने वाली कुरण्टक पुष्प की माला हो। पास ही भूमि पर गोल आसन बिछा हुआ हो जिसके पीछे मसनद (गोल तकिया) लगा हुआ हो। द्यूतक्रीड़ा के लिये आकर्षफलक और द्यूतफलक हों। उसके बाहर क्रीड़ापक्षी (शुकसारिका आदि) पिंजड़ों में टैगे हुए हों। एकान्त में दारुकर्म (बढ़ईगिरी) तथा अन्य मनोविनोदों के लिए स्थान हों। वृक्षवाटिका में सघन छाया वाले लतामण्डप में झूला पड़ा हुआ हो। वहाँ बैठने के लिये पुष्पों से युक्त वेदिकाएँ या चबूतरे (बैंच) बने हों इस प्रकार भवन-विन्यास समाप्त हुआ ॥ ४ ॥
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स प्रातरुत्थाय कृतनियतकृत्यः, गृहीतदन्तधावनः, मात्रयानुलेपनं धूपं स्वजमिति च गृहीत्वा दत्त्वा सिक्थकमलक्तकं च दृष्ट्वादशें मुखम्, गृहीतमुखवास ताम्बूलः, कार्याण्यनुतिष्ठेत् ॥ ५ ॥
A well-bred townsman gets up very early in the morning, performs his natural functions, and cleans his teeth. Having carefully washed his face, he rubs it with ointment and marks the sacred signs on his brow, using sandalwood. He dyes his hair, using wax and lacquer, while looking at himself in a mirror. Then, having eaten some betel, he places a necklace of scented flowers around his neck, after which he begins his daily routine.
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नित्यकृत्य दिनचर्या - नागरक को प्रातः काल उठकर, शौचादि से निवृत्त होकर, दन्तधावन (मञ्जन या दातुन करके उचित मात्रा में मस्तक पर चन्दन लगाकर केशों को धूप से धूपित कर, माला धारण कर, मोम और आलता लगाकर, दर्पण में मुख देखकर और सुवासित ताम्बूल खाकर दैनिक कार्यों में लगना चाहिये ॥ ५ ॥
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