न कामाँश्चरेत् । धर्मार्थयोः प्रधानयोरेवमन्येषां च सतां प्रत्यनीकत्वात्। अनर्थजनसंसर्गमसद्व्यवसायमशौचमनायतिं चैते पुरुषस्य जनयन्ति ॥ ३२ ॥
One cannot give oneself over to pleasure without re¬ strictions. One's activities must be coordinated taking due account of the importance of virtue and material goods.
english translation
काम का आचरण नहीं करना चाहिये, क्योंकि यह प्रधान पुरुषार्थ धर्म और अर्थ के तथा सज्जनों के विरुद्ध है। यह मनुष्य में अनर्थकारी लोगों का संसर्ग, असत् कर्म, अपवित्रता और प्रभावहीनता (पराक्रम एवं यश का अभाव) उत्पन्न करता है ॥ ३२ ॥
hindi translation
na kAmA~zcaret | dharmArthayoH pradhAnayorevamanyeSAM ca satAM pratyanIkatvAt| anarthajanasaMsargamasadvyavasAyamazaucamanAyatiM caite puruSasya janayanti || 32 ||
Thus King Dandakya of the line of the Bhojas ruined his life, his family and his kingdom, for having raped the daughter of a Brahman.
english translation
जैसे भोजवंशीय दाण्डक्य नामक राजा काम के वशीभूत होकर ब्राह्मण कन्या को कामतृप्ति का साधन मानने के कारण अपने बन्धुबान्धव और राष्ट्र सहित नष्ट हो गया ॥ ३५ ॥