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नोद्विग्नचित्तो व्यसनेषु निःस्पृहः श्रुतेषु दृष्टेषु गुणेष्ववस्तुदृक् । दान्तेन्द्रियप्राणशरीरधीः सदा प्रशान्तकामो रहितासुरोऽसुरः ।। ७-४-३३ ।।

Although Prahlāda Mahārāja was born in a family of asuras, he himself was not an asura but a great devotee of Lord Viṣṇu. Unlike the other asuras, he was never envious of Vaiṣṇavas. He was not agitated when put into danger, and he was neither directly nor indirectly interested in the fruitive activities described in the Vedas. Indeed, he considered everything material to be useless, and therefore he was completely devoid of material desires. He always controlled his senses and life air, and being of steady intelligence and determination, he subdued all lusty desires. ।। 7-4-33 ।।

english translation

यद्यपि प्रह्लाद महाराज का जन्म असुर वंश में हुआ था, किन्तु वे स्वयं असुर न होकर भगवान् विष्णु के परम भक्त थे। अन्य असुरों की तरह वे कभी भी वैष्णवों से ईर्ष्या नहीं करते थे। कठिन परिस्थिति आने पर वे कभी क्षुब्ध नहीं होते थे और वेदों में वर्णित सकाम कर्मों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भी रुचि नहीं लेते थे। निस्सन्देह, वे हर भौतिक वस्तु को व्यर्थ मानते थे; इसलिए वे भौतिक इच्छाओं से पूर्णतया रहित थे। वे सदैव अपनी इन्द्रियों तथा प्राणवायु पर संयम रखते थे। स्थिरबुद्धि तथा संकल्पमय होने के कारण उन्होंने सारी विषय-वासनाओं का दमन कर लिया था। ।। ७-४-३३ ।।

hindi translation

nodvignacitto vyasaneSu niHspRhaH zruteSu dRSTeSu guNeSvavastudRk | dAntendriyaprANazarIradhIH sadA prazAntakAmo rahitAsuro'suraH || 7-4-33 ||

hk transliteration by Sanscript