1.
सहायगम्यागम्यगमनकारणचिन्ताप्रकरणम्
Advice of the Assistants on the choice of Lovers
2.
कान्तानुवृत्तप्रकरणम्
Looking for a steady Lover
3.
अर्थागमोपायप्रकरणम्
Ways of Making Money
4.
विशीर्णप्रतिसन्धानप्रकरणम्
Friendship with a former Lover
5.
लाभविशेषप्रकरणम्
Occasional Profits
•
अर्थानर्थानुबन्धसंशयविचारप्रकरणम्
Profits and Losses
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6
अनर्थोऽधर्मो द्वेष इत्यनर्थत्रिवर्गः ॥ ६ ॥
Lack of money, lack of virtue, and hate are the three sources of sorrow.
english translation
अनर्थत्रिवर्ग- अनर्थ, अधर्म और द्वेष—यह अनर्थत्रिवर्ग है ॥ ६ ॥
hindi translation
anartho'dharmo dveSa ityanarthatrivargaH || 6 ||
7
तेष्वाचर्यमाणेष्वन्यस्यापि निष्पत्तिरनुबन्धः ॥ ७ ॥
In practice, the other kinds of misfortune depend on these.
अनुबन्ध-स्वरूप - अर्थ आदि को सिद्ध करते हुए उसके साथ जो दूसरा स्वतः सिद्ध हो जाये, उसे 'अनुबन्ध' कहते हैं ॥ ७ ॥
teSvAcaryamANeSvanyasyApi niSpattiranubandhaH || 7 ||
8
सन्दिग्धायां तु फलप्राप्तौ स्याद्वा न वेति शुद्धसंशयः ॥ ८ ॥
If the expected profit is not certain to be obtained without difficulty, it is proper to have some hesitation.
शुद्धसंशय यह होगा या नहीं ? इस प्रकार फलप्राप्ति में सन्देह होना 'शुद्ध संशय ' कहलाता है ॥ ८ ॥
sandigdhAyAM tu phalaprAptau syAdvA na veti zuddhasaMzayaH || 8 ||
9
इदं वा स्यादिदं वेति सङ्कीर्णः ॥ ९ ॥
It is difficult to foresee the outcome right at the start.
संकीर्णसंशय - 'यह फल होगा या यह फल ? – यह सङ्कीर्णसंशय है ॥ ९ ॥
idaM vA syAdidaM veti saGkIrNaH || 9 ||
10
एकस्मिन् क्रियमाणे कार्ये कार्यद्वयस्योत्पत्तिरुभयतोयोगः ॥ १० ॥
It is only in practice that one or other of these eventualities may occur.
उभयतोयोग – जब एक कार्य करने पर दूसरे कार्य की उत्पत्ति स्वतः हो जाये तो उसे 'उभयतो योग' कहते हैं ॥ १० ॥
ekasmin kriyamANe kArye kAryadvayasyotpattirubhayatoyogaH || 10 ||
Chapter 6
Verses 1-5
Verses 11-15
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Kamasutra
About Courtesans
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english