Kamasutra
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न शास्त्रमस्तीत्येतावत् प्रयोगे कारणं भवेत् । शास्त्रार्थान् व्यापिनो विद्यात् प्रयोगांस्त्वेकदेशिकान् ॥ ४१ ॥
The fact of something being mentioned in the sacred books does not mean that it can be practiced. Knowledge is universal, but practice depends on the customs of each country.
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शास्त्र की व्यापकता और प्रयोगों की एकदेशीयता- 'इस बात को शास्त्र कहता यही प्रयोगों का कारण नहीं होना चाहिये; क्योंकि शास्त्र का विषय तो व्यापक हुआ करता है, उसमें शुभ अशुभ सभी विषय वर्णित होते हैं, लेकिन प्रयोग सीमित और एकदेशीय ही हुआ करते हैं ॥ ४१ ॥
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रसवीर्यविपाका हि श्वमांसस्यापि वैद्यके। कीर्तिता इति तत्किं स्याद् भक्षणीयं विचक्षणैः ॥ ४२ ॥
According to medical treatises, wine increases virile power, as does dog meat. Although this is a well-known fact, what circumspect man would eat it?
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आयुर्वेद में कुत्ते के मांस को सरस और वीर्यवर्धक बताया गया है, किन्तु क्या इससे विचारशील व्यक्ति को कुत्ते का मांस खा लेना चाहिये ! ॥ ४२ ॥
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सन्त्येव पुरुषाः केचित् सन्ति देशास्तथाविधाः । सन्ति कालाश्च येष्वेत योगा न स्युर्निरर्थकाः ॥ ४३ ॥
For some men, in some countries, in given circumstances or moments, this kind of sexual relationship is not without its own raison d'etre.
english translation
विवेचन की सार्थकता कुछ ऐसे भी व्यक्ति होते हैं, कुछ ऐसे भी देश होते हैं, और कुछ ऐसा समय भी होता है जिनके लिये ये लोग निरर्थक नहीं, बल्कि उपयोगी हो हैं ॥ ४३ ॥
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तस्माद्देशं च कालं च प्रयोगं शास्त्रमेव च । आत्मानं चापि संप्रेक्ष्य योगान्युञ्जीत वा न वा ॥ ४४ ॥
It is by taking into account the country, the period, custom, the injunctions of the sacred texts, as well as one's own tastes, that one decides whether or not to practice these kinds of sexual relations.
english translation
प्रयोक्ता के विचारणीय विषय-अतएव देश, काल, व्यवहार, शास्त्र और अपने को देखकर जो विधि एवं योग शिष्ट एवं ग्राह्म हों, उन्हें ही प्रयोग करें अर्थात् जो विधि एवं प्रयोग अशिष्ट एवं अग्राह्य हैं, उन्हें त्याग दे ॥ ४४ ॥
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अर्थस्यास्य रहस्यत्वाच्चलत्वान्मनसस्तथा । कः कदा किं कुतः कुर्यादिति को ज्ञातुमर्हति ॥ ४५ ॥
Practiced according to his fantasy and in secret, who can know who, when, how, and why he does it?
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यह औपरिष्टक कर्म नितान्त एकान्त में किया जाता है, और गुप्त ही रखा जाता है। मन अत्यन्त चंचल है। अतएव कौन व्यक्ति किस कारण से, कब, क्या कर डाले- इसे कौन जान सकता है ! ॥ ४५ ॥
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