Kamasutra

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दिवापि जनसम्बाधे नायकेन प्रदर्शितम् । उद्दिश्य स्वकृतं चिह्नं हसेदन्यैरलक्षिता ॥ ४१ ॥

During the day, when the boy shows various persons the marks his mistress made, the latter, without a glance, should start laughing.

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प्रकाश की चेष्टाएँ- एकान्त की चेष्टाओं को कहकर, अब प्रकाश की चेष्टाएँ कहते हैन केवल रात्रि, बल्कि दिन में, मनुष्यों की भीड़ में भी नायक के शरीर पर अपने द्वारा किये, गये चिह्नों (नखक्षत एवं दन्तक्षत) को लक्ष्य करके इस प्रकार हँसे कि कोई अन्य न जान पाये ॥ ४९ ॥

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विकूणयन्तीव मुखं कुत्सयन्तीव नायकम् । स्वगात्रस्थानि चिह्नानि सासूयेव प्रदर्शयेत् ॥ ४२ ॥

Then, turning her head away, or accusing her lover, she should show everyone the wounds he has left on her body.

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अपने मुख को चुम्बन लेने के समान संकुचित करके, नायक को झिड़कती हुई-सी असहनशील के समान, पति द्वारा अपने शरीर पर अंकित किये गये चिह्नों (नखक्षत एवं दन्तक्षत) को दिखाये ॥ ४२ ॥

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परस्परानुकूल्येन तदेवं लज्जमानयोः । संवत्सरशतेनापि प्रीतिर्न परिहीयते ॥ ४३ ॥

Whether they continue having sexual relations, or live chastely together, true love never decreases, even after one hundred years.

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परस्पर अनुकूलता और सलज्जता का भाव रखने वाले स्त्री-पुरुष की प्रीति सौ वर्ष में भी क्षीण नहीं होती ॥ ४३ ॥

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