However submissive or reticent the woman may be by nature, she is quick at learning the games of love, the specialists explain.
english translation
जो स्त्रियाँ स्वभावतः कोमलाङ्गी हैं और जो किञ्चित् कठोर अङ्गों वाली, फलतः आलिङ्गन, चुम्बन, कुचमर्दन आदि बाह्य उपचारों से उपमर्दन करने योग्य हैं, वे सभी समुचित रीति से समागम करने पर शीघ्र ही रतिसुख प्राप्त कर लेती हैं—ऐसा कामशास्त्र के आचार्यों का मत है ॥ ३७ ॥
What has been said up to now concerning sexual relations has been said briefly, being intended for intelligent men. We will now explain in greater detail for people who are hard of understanding.
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स्त्री-पुरुष के समागम के विषय में, विद्वानों के लिए इतना विवेचन ही पर्याप्त है। मन्दबुद्धि व्यक्तियों को समझाने के लिये अब इसे विस्तार से कहेंगे ॥ ३८ ॥
अभ्यासादभिमानाच्य तथा सम्प्रत्ययादपि । विषयेभ्यश्च तन्त्रज्ञाः प्रीतिमाहुश्चतुर्विधाम् ॥ ३९ ॥
Those who know the mechanics [tantra] of relations say that attraction [priti] is born in four ways: from practice [abhyasa], from imagination [vichara . abhimana], from substitution [sampratyapada], or from the object [vishaya].
english translation
प्रीति के भेद-कामशास्त्र के आचायों का मत है कि प्रीति चार प्रकार की होती है- १. आभ्यासिकी- निन्तर कर्मों के अभ्यास से उत्पन्न, २. आभिमानिकी – सङ्कल्पमात्र से उत्पन्न, ३. सम्प्रत्ययात्मिका विश्वास से उत्पन्न, और ४. विषयात्मिका-विषयों से उत्पन्न ।। ३९ ।।
शब्दादिभ्यो बहिर्भूता या कर्माभ्यासलक्षणा । प्रीतिः साभ्यासिकी ज्ञेया मृगयादिषु कर्मसु ॥ ४० ॥
Love born from practice [abbyasa] All activities of the senses, starting with speech, require continuous practice in order to manifest themselves. Love is born of long practice, like the love of hunting for the hunter.
english translation
१. आभ्यासिकी प्रीति-शब्दादिक के अतिरिक्त कर्मों में निरन्तर लगे रहने से जो प्रीति उत्पन्न होती है, वह अभ्यास से बढ़ने के कारण आभ्यासिकी कहलाती है, जैसे मृगया (शिकार) आदि कर्मों में देखी जाती है ॥ ४० ॥