भवतश्चात्र श्लोकौ - तद्वृत्तमनुवर्तेत नायकस्य हितैषिणी । कुलयोषा पुनर्भूर्वा वेश्या वाप्येकचारिणी ॥ धर्ममर्थं तथा कामं लभन्ते स्थानमेव च। निःसपलं च भर्तारं नार्यः सद्वृत्तमाश्रिताः ॥ ४८ ॥
Two verses in this connection: "She who wishes the hero's well-being leads an irreproachable life as suits a single wife, whether she comes from a good family or is an ex-courtesan. Women protected by good conduct obtain respectability, riches and love, a social status as well as a protector [bhartara] without other wives."
english translation
इस विषय में दो आनुवंश्य श्लोक प्राप्त होते हैं- एकचारिणी भार्या का चाहे वह कुलवधू हो, पुनर्भू हो अथवा वेश्या हो, यह कर्तव्य है कि वह अपने पति की हितैषिणी बनकर सदाचार का पालन करे। स्त्रियाँ सदाचार पर चलकर ही धर्म, अर्थ, काम, प्रतिष्ठा और सपत्नी (सौत) विहीन पति प्राप्त करती हैं ॥ ४८ ॥
hindi translation
bhavatazcAtra zlokau - tadvRttamanuvarteta nAyakasya hitaiSiNI | kulayoSA punarbhUrvA vezyA vApyekacAriNI || dharmamarthaM tathA kAmaM labhante sthAnameva ca| niHsapalaM ca bhartAraM nAryaH sadvRttamAzritAH || 48 ||
hk transliteration by Sanscript