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स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रसङ्गात् ॥३-५१॥

On receiving invitation from high places i.e. from big clans or families or from big people, a Yogi should not be angry and proud. Doing this again creates hindrances or distracting reasons in yoga practice.

english translation

उच्च स्थानों अर्थात बड़े कुल अथवा घरानों से या फिर बड़े व्यक्तियों के द्वारा निमन्त्रण मिलने पर योगी को राग और अभिमान ( घमन्ड ) नहीं करना चाहिए । ऐसा करने से योग साधना में दोबारा से बाधा या विचलित करने वाले कारण पैदा हो जाते हैं ।

hindi translation

sthAnyupanimantraNe saGgasmayAkaraNaM punaraniSTaprasaGgAt ||3-51||

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क्षणतत्क्रमयोः संयमाद्विवेकजं ज्ञानम् ॥ ३-५२॥

By making samyama on single moments and on their sequence in time, one gains discriminative knowledge.

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क्षण एवं क्षण कि निरंतरता में संयम करने से योगी को विवेकज ज्ञान की प्राप्ति होती है ।

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kSaNatatkramayoH saMyamAdvivekajaM jJAnam || 3-52||

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जातिलक्षणदेशैरन्यतानवच्छेदात् तुल्ययोस्ततः प्रतिपत्तिः ॥३-५३॥

Thus one is able to distinguish between two exactly similar objects, which cannot be distinguished by their species, characteristic marks, or positions in space.

english translation

जाति, लक्षणों व स्थान से एक ही जैसी दिखने वाली वस्तुओं में अन्तर ( फर्क ) न पता चलने की स्थिति में उस विवेक ज्ञान के द्वारा योगी को उन दो अलग- अलग वस्तुओं के बीच के अन्तर ( फर्क ) का पता चल जाता है ।

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jAtilakSaNadezairanyatAnavacchedAt tulyayostataH pratipattiH ||3-53||

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तारकं सर्वविषयं सर्वथाविषयम् अक्रमं चेति विवेकजं ज्ञानम् ॥३-५४॥

The discriminative knowledge that simultaneously comprehends all objects in all conditions is the intuitive knowledge which brings liberation.

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योगी के स्वयं के योग साधना से प्राप्त सामर्थ्य से उत्पन्न होने वाला, जो सभी पदार्थों के विषयों को उनके सभी कालों भूत, वर्तमान व भविष्य को जानने वाला होता है और यह सब बिना किसी क्रम अर्थात विभाग के ही पैदा होने वाला ज्ञान होता है । ऐसे ज्ञान को विवेकज या विवेक से उत्पन्न ज्ञान कहा जाता है ।

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tArakaM sarvaviSayaM sarvathAviSayam akramaM ceti vivekajaM jJAnam ||3-54||

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सत्त्वपुरुषयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यमिति ॥३-५५॥

Absolute freedom occurs when the lucidity of material nature and spirit are in pure equlibrium.

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जब बुद्धि और जीवात्मा की समान रूप से शुद्धि हो जाती है । तब वह कैवल्य या मोक्ष की अवस्था कहलाती है ।

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sattvapuruSayoH zuddhisAmye kaivalyamiti ||3-55||

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