तत्र लावकहंसविकूजितं त्वरयैव इति स्तननग्रहणनयोगाः ॥ २१ ॥
When she is struck on the breasts, her cries are like those of a partidge or a goose.
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इसके सीत्कार - समतलक प्रहार करने पर हंस और लवा (बटेर) आदि पक्षियों की बोली का अनुकरण करना चाहिये। इस प्रकार स्तननप्रहणन सम्बन्धी प्रकरण पूर्ण हुआ ॥ २१ ॥
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tatra lAvakahaMsavikUjitaM tvarayaiva iti stananagrahaNanayogAH || 21 ||
भवतश्चात्र श्लोकौ — पारुष्यं रभसत्वं च पौरुषं तेज उच्यते। अशक्तिरार्तिर्व्यावृत्तिरबलत्वं च योषितः ।। २२ ।।
Quotation: "Vigor and audacity are manly qualities. Weakness, sensuality, and dependence are female characteristics."
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इस विषय में दो आनुवंश्य श्लोक मिलते हैं-कठोरता, धृष्टता और साहस पुरुष के सहज धर्म हैं और असमर्थता, पीड़ित होना, निराकरण करना और सुकुमारता स्त्री के फलतः पुरुष का स्वभाव प्रहणन के अनुकूल है और स्त्री का सौत्कार के ॥ २२ ॥
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bhavatazcAtra zlokau — pAruSyaM rabhasatvaM ca pauruSaM teja ucyate| azaktirArtirvyAvRttirabalatvaM ca yoSitaH || 22 ||
रागात् प्रयोगसात्म्याच्च व्यत्ययोऽपि क्वचिद् भवेत् । न चिरं तस्य चैवान्ते प्रकृतेरेव योजनम् ॥ २३ ॥
Sometimes, out of passion, custom, or temperament, the woman inverts the situation. This is only temporary, however, and nature ends by taking back its due.
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स्त्री-पुरुष के ये धर्म सार्वत्रिक नहीं हैं। राग के चरम सीमा पर पहुँचने पर या देश, काल और प्रकृति की अनुकूलता से उसकी विपरीतता भी देखी जाती है, अर्थात् इन स्थितियों में स्त्री अपने सहज धर्म-सुकुमारता और सलज्जता को छोड़कर और पुरुष जैसा कठोर बनकर, अपहस्तक आदि का वार कर सकती है, लेकिन यह विपरीतता अधिक समय तक नहीं चलती, और अन्त में दोनों प्रकृतिस्थ हो जाते हैं ॥ २३ ॥
Besides the four forms of aggression mentioned, four others are utilized by the peoples of the South, which are: the nail [kila] on the chest the knife [kartari] on the head the borer [viddha] on the cheeks the pincers [sandanshika] on the breasts. These make eight in all. In the South, "nail" marks can be seen on the girls' breast. This is the custom of the country.
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दाक्षिणात्यों के कष्टद प्रहणन छाती में कीला, सिर में कर्तरी, कपोलों में विद्धा और स्तनों एवं बगलों में सन्देशिका-ये चार तथा पूर्वोक चार अपहस्तक, प्रसृतक, मुष्टि और समतलक—कुल आठ प्रकार के ग्रहणन दक्षिण देशवासियों में प्रचलित हैं। वहाँ की युवतियों के वक्षःस्थल पर कीला और उसके कार्य देखे जाते हैं। यह देशाचारमात्र है, अतएव जहाँ प्रचलित है, वहाँ के निवासियों के ही अनुकूल पड़ता है, सबके लिये नहीं ॥ २४ ॥