॥ ब्रह्मोवाच ॥ ॥ तच्छ्रुत्वा शिरसा नत्वा परिक्रम्य स्तुवन्विभुम् ॥ बहिर्गत्वा हरिन्देवान्प्रणम्य समुपास्त सः ॥ २४ ॥
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