एकस्मिन्नव्यये शान्ते चिदाकाशेऽमले त्वयि। कुतो जन्म कुतो कर्म कुतोऽहंकार एव च॥१५- १३॥
इस अव्यय, शांत, चैतन्य, निर्मल आकाश में तुम अकेले ही हो, अतः तुममें जन्म, कर्म और अहंकार की कल्पना किस प्रकार की जा सकती है॥१३॥
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एकस्मिन्नव्यये शान्ते चिदाकाशेऽमले त्वयि। कुतो जन्म कुतो कर्म कुतोऽहंकार एव च॥१५- १३॥
इस अव्यय, शांत, चैतन्य, निर्मल आकाश में तुम अकेले ही हो, अतः तुममें जन्म, कर्म और अहंकार की कल्पना किस प्रकार की जा सकती है॥१३॥
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